Director Kalpana Lajmi Passed Away

दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

मारुति वैन संख्या यूपी 32 ईएन9175, महानगर स्थित माँटफोर्ट स्कूल की वैन। वैन में लगे गैस सिलेंडर से लेकर ड्राइवर सीट के बीच में लगी बेंच और अंदर बैठे बच्चे। जी हां, इन स्कूलों की अभी दस दिन पहले ही परिवहन विभाग ने जांच की है लेकिन वैन देख कर साफ दिखता है कि कम से कम इस वाहन तक पहुंचे ही नहीं थे।

कुशीनगर में हुए दर्दनाक हादसे ने परिवहन विभाग की कलई उधेड़ कर रख दी है। कुशीनगर की बात क्यों करें, राजधानी ही देंखे। हर इलाके में स्कूलों में चल रहे निजी वाहन संचालकों ने मासूम बच्चों को केवल कमाई का जरिया बना डाला है। स्कूल का परमिट और टैक्स में छूट फिर भी भाड़ा आसमान पर। वह भी मनमाना। उस पर भी सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं। मगर परिवहन विभाग को इससे कोई सरोकार नहीं रहता है। जिलाधिकारी का दफ्तर हो या फिर परिवहन आयुक्त कार्यालय, दिन भर इस पर तरह के वाहन फर्राटा भरते हैं लेकिन मजाल है कि कोई अधिकारी इन वाहन को रोक लें। केवल इतना ही नहीं, परिवहन विभाग की मुस्तैदी ऐसी है कि जिन वाहनों को स्कूल परमिट दिया है, उन्हें भी वह स्कूली नहीं मानता। लिहाजा बड़े स्कूल में तो स्कूल वाहन संचालकों का पूरा सिंडीकेट तैयार हो गया।

स्कूलों की मनमानी, अभिभावकों की गर्ज और प्रशासन की उदासीनता का नतीजा है कि मासूम बच्चे, टेंपो-बैट्री रिक्शा और आटो रिक्शा पर लद कर स्कूल पहुंच रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी जिम्मेदारों की नहीं है। अलबत्ता उन्हें इसे रोकने की फुर्सत नहीं है। दरअसल विभाग खुद बैठ कर हादसे का इंतजार करता है और हादसे के बाद कुछ दिन –घंटों के जांच होती है लेकिन फिर सब पुराने ढर्रे पर।

राजधानी में कई डिवाइऩ पब्लिक स्कूल

कुशीनगर हादसे में जांच के बाद सामने आया कि जिस स्कूल की वैन थी, वह पंजीकृत ही नहीं था। मुख्यमंत्री के सख्त तेवर के बाद प्रशासन–सरकार कार्रवाई का दम भर रही है लेकिन हकीकत यह है कि राजधानी में ही इस तरह के तमाम स्कूल हैं, जिनके नाम केवल स्कूल परमिट हासिल करने के लिए हैं। चौपटियां से लेकर महानगर –इंदिरानगर तक बड़े बड़े आपरेटर केवल स्कूली वाहनों का सिंडीकेट चला रहे हैं। अधिकारियों व दलालों की मदद से इन्हें सहजता से स्कूल परमिट मिल जाते हैं और उसके बाद फिटनेस से लेकर टैक्स तक सारा काम केवल पैसा देकर होता है।

दरअसल दिसंबर 2018 में स्कूली वाहन के हादसे के बाद यह प्रकरण उठा लेकिन सालों से जमे भ्रष्ट अधिकारियों ने कभी फिटनेस के वक्त वाहन का अनुबंध देखने तक की जहमत नहीं उठाई । इसी का परिणाम पिछले दिनों शासन के आदेश पर हुई स्कूली वाहनों की जांच का अभियान था, जिसमें स्कूलों से सम्बद्ध वाहनों को जांच से अलग कर दिया गया। अब इस प्रकरण पर कोई अधिकारी सफाई देने को तैयार नहीं है।

ड्राइवर की दांव पर मासूमों की जान

सुबह स्कूल लगने का समय सात बजे और दर्जनों बच्चों लाद कर हवा में फर्राटा  भरती स्कूली बच्चे ले जाने वाली मारुति वैन, टेंपो और अनुबंधित बसें। यह नजारा तकरीबन रोज राजधानी में दिखता है। सुबह का समय होने के कारण ट्रैफिक पुलिस के होने की उम्मीद न के बराबर रहती है। परिवहन विभाग के अधिकारी शासन के आदेश के बाद ही सड़क पर निकलते हैं, वह अभी अपनी सुविधानुसार। यानी जिस अधिकारी का घर जिधर, उसकी आसपास की जांच। नतीजा यह है कि स्कूली वाहनों में नियमों के उल्लंघन अब खुलेआम चल रहा है और इस पर लगाम लगती भी कम ही दिखती है।

 

जांच को पहुंचे अपर आयुक्त

कुशीनगर में हुए हादसे की जांच के लिए अपर परिवहन आयुक्त बीके सिंह गुरुवार को कुशीनगर में जांच के लिए पहुंच गए। उन्होंने बताया कि यह सही है कि जिस वाहन का हादसा हुआ, वह पंजीकृत नहीं था लेकिन कैसे चल रहा था, इसकी जांच हो रही है और जिम्मेदार अधिकारी बख्शे नहीं जाएंगे। उन्होंने कहा कि पिछले स्कूली वाहनों की जांच में निजी वाहनों की जांच नहीं की गई थी लेकिन अब इसके लिए सघन कार्रवाई शुरू की जाएगी।

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