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जीएसटी के नाम पर कालाबाजारी

Rising At 8am | 28-Jul-2017 | Posted by - Admin

  • थोक दाम गिरने के बावजूद फुटकर में राहत नहीं

   
Fraud in the name of GST done by Merchants from Normal Man

दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

गुड्स एंड सर्विस टैक्स लागू करने से पहले इसे देशहित और जनहित में करार देने वाली सरकार फिलहाल आंख मूंदे हुए हैं। दाल से लेकर वनस्पति के दाम गिरने के दावे हो रहे हैं लेकिन हकीकत में इसका फायदा आम आदमी को नहीं मिल पा रहा है। व्यापारियों के मान मुनव्वल में लगी सरकार भी सख्ती करने से परहेज कर रही है, नतीजा यह है कि लोगों से जमकर वसूली हो रही है। दवा, साबुन से लेकर पान मसाला तक ब्लैक में बिक रहा है। तमाम विद्युत उपकरण महंगे हो गए हैं क्योंकि कारोबारियों के पास माल उपलब्ध नहीं है।

इलेक्ट्रिक कांट्रैक्टर्स एंड मर्चेंट्स एसोसिशन के पराग गर्ग बताते हैं कि जीएसटी लगने के बाद बिलिंग का स्थिति अब तक स्पष्ट नहीं है। लिहाजा तमाम कारोबारी आर्डर देने से परहेज कर रहे हैं। इसी तरह से नई टैक्स प्रणाली व दरों को लेकर कंपनियां भी फिलहाल उत्पादन सीमित ही कर रही है। लिहाजा बाजार में अब शार्टेज हो रही है। इसका फायदा उन कारोबारियों को मिल रहा है, जिनके पास पर्याप्त स्टाक है। इसके अलावा कंपनियों ने अपने दामों में तीन से आठ फीसद तक इजाफा कर दिया है। नतीजा यह है कि जीएसटी लग जाने के कारण जो माल पहले दुकानदारों के पास है, उस पर टैक्स बढ़ गया और वह उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ रहा है। इसके अलावा सरकार द्वारा माल के परिवहन को लेकर ई वे बिल का जो प्रावधान किया गया, वह ही स्पष्ट नहीं है।

 

इस कारण से अभी तक माल का परिवहन प्रभावित चल रहा है। पान मसाला व्यापार मंडल के अध्यक्ष बलराम मौर्य के मुताबिक बाजारों में ज्यादा दाम वसूली औऱ कालाबाजारी की वजह भी यही है। बाहर से सुपारी – कत्था आदि की आपूर्ति प्रभावित चल रही है। इसी तरह से उत्पादन पर टैक्स कितना होगा और सेस कितना होगा, इसकी गणना भी स्पष्ट नहीं हो परा रही है। नतीजा यह है कि तमाम कारोबारी बहुत सीमित उत्पादन कर रहे है। इस कारण से बाजारों में कई ब्रांड का माल पहुंच नहीं पा रहा है और फुटकर व्यापारी ज्यादा मुनाफाखोरी में जुट गए हैं।

बाजार बेकाबू

 

जीएसटी लागू कराने की आपाधापी में सरकार ने पंद्रह सितंबर प्रवर्तन कार्य को शिथिल करने की घोषणा कर रखी है। लिहाजा पूरा बाजार मुनाफाखोरों के हाथ में पहुंच गया है। थोक दाम गिर जाने के बावजूद लोगों को उनका वाजिब हक नहीं मिल रहा है। यही नहीं, जिन उत्पादों पर टैक्स की दरें कम हुई है या बढ़ी हैं, उन पर पुराने मूल्यों के बराबर ही स्टीकर द्वारा नए मूल्य प्रदर्शित करने के आदेश हुए लेकिन अमल सिफर है। यानी कारोबारियों ने नए मूल्य तो लगाए नहीं, और पुराने एमआरपी पर ही ज्यादा दाम वसूल रहे हैं। यह खेल सबसे ज्यादा दवा मार्केट में चल रहा है।

 

कोई सुनवाई नहीं

 

वाणिज्य कर विभाग के अपर आय़ुक्त के मुताबिक जीएसटी के तहत फिलहाल नए सामान की आपूर्ति बहुत कम हो रही है। व्यापारियों के पास पुराना स्टाक है औऱ अगर टैक्स बढ़ा है तो दाम भी बढ़ेंगे। यह जरूर है कि कुछ लोग इसका बेजा फायदा उठा रहे हैं। ऐसे लोग ज्यादा समय तक नहीं बच सकेंगे।


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