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लेसा में संदिग्ध उपभोक्‍ताओं पर नाम महाघोटाला

Rising At 8am | 30-Nov-2017 | Posted by - Admin

 

  • दो साल में बढ़ गए 76 हजार संदिग्ध उपभोक्ता
   
Fraud in the name of Electricity Bill in Lucknow

दि राइजिंग न्‍यूज

अमित सिंह

लखनऊ।

 

हर साल बिजली मीटरों की रीडिंग से लेकर मीटर की जांच तक में करोड़ों रुपये खर्च करने वाले लेसा अभियंताओं के संरक्षण में एक घोटाला चल रहा है। दरअसल यह घोटाला है संदिग्ध उपभोक्ताओं का। एक तरफ लेसा प्रशासन 80 फीसद से ज्यादा उपभोक्ताओं की बिलिगं का दम भरता है मगर इन दावों के बीच गुजरे दो साल में करीब 76 हजार उपभोक्ता लापता हो गए। अब ये उपभोक्ता लापता हुए या कर दिए गए, इसकी जांच कराने की जहमत कभी लेसा ने नहीं उठाई। बात उस वक्त ज्यादा गंभीर हो जाती है, जब घाटे का नाम लेकर बिजली विभाग लगातार बिजली की कीमतें बढ़ा रहा है लेकिन कीमतों की तरह से हर साल फिक्टीशियस (संदिग्ध) उपभोक्ताओं की संख्या में इजाफा हो रहा है।

 

दरअसल फिक्टीशियस उपभोक्ताओं का खेल लेसा में बहुत पुराना है। बड़े बकायेदारों के खातों मे हेरफेर कर उन्हें नया कनेक्शन जारी कर दिया जाता है। उपभोक्ता के कनेक्शन आईडी में मामूली से परिवर्तन कर नया खाता खोल दिया जाता है और पुराना संदिग्ध की सूची में डाल दिया जाता है। उसके बाद उसकी जांच भी बंद हो जाती है। ऐसा खेल तब हो रहा है जब लेसा कनेक्शन देते वक्त परिसर की पूरा विवरण अपने रिकार्ड में जमा कराता है। सवाल यह है कि परिसर कैसे गायब हो रहे हैं, इस बारे में अभियंता दायें बाएं जवाब देते हैं।

जबकि इन्हीं फिक्टीशिस उपभोक्ताओं की जमीन पर कोई नया निर्माण होता है, लेसा पूरा रिकार्ड लेकर हाजिर हो जाता है। लेसा में इस तरह के कई घोटाले सामने आ चुके हैं। करीब एक दशक पहले सामने आया पासवर्ड घोटाला भी कुछ इसी तर्ज पर था। उस वक्त भी बड़े बकायेदारों को नए कनेक्शन जारी दिए गए थे और पुराने खातों को फिक्टीशियस करार दे दिया गया था। इस चर्चित मामले की जांच सीबीआई से कराने की संस्तुति तत्कालीन एमडी उदय नारायण ने की थी लेकिन उसे दरकिनार कर दिया गया।

 

अब जरा गौर करें। लेसा के आकड़ों के मुताबिक 2015 में कुल उपभोक्ता 8067717 थे इनमें 669843 उपभोक्ताओं की बिलिंग हो रही थी। यानी एक लाख 36 हजार उपभोक्ता संदिग्ध थे। वर्तमान में यानी नवंबर 2017 में लेसा के आकड़ों  के मुताबिक कुल उपभोक्ता 989894 हैं जिनमें बिलिंग 783139 की हो रही है। यानी करीब दो लाख छह हजार उपभोक्ता फिक्टीशियस हैं। सवाल यह है कि दो साल में दो साल में 76 हजार उपभोक्ता लापता कैसे हो गए। अगर उपभोक्ता लापता हो गए तो उन परिसरों में नए बिजली कनेक्शन कैसे लग गए। ये तमाम मामले में लेसा में व्याप्त भ्रष्टाचार का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

दो साल में फिक्टीशियस उपभोक्ताओं की संख्या में इजाफे की बावत मुख्य अभियंता आशुतोष कुमार कंप्यूटर पर पुराने खाते दोबारा खुल जाना बताते हैं मगर यह नहीं बता पाते कि आखिर इनकी संख्या में इजाफा कैसे हो गया। यही नहीं, जो उपभोक्ता मिल नहीं रहे हैं, उनसे वसूली के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई गई, इस का भी उनके पास कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है। खास बात यह है कि पिछले दो साल में आशुतोष कुमार ही लेसा के मुख्य अभियंता हैं।

बिलिंग में भी कमीशनखोरी का खेल

 

लेसा के मुख्य अभियंता से बात की जाएं तो राजधानी में उपभोक्ताओँ की संख्या करीब साढ़े नौ लाख बताई जाती है। सरकारी आकड़ों में भी उपभोक्ताओं की संख्या इतनी ही दिखाई जाती है लेकिन बिलिंग कंपनियों को भुगतान के लिए हर डिवीजन में औसतन 25 फीसद उपभोक्ताओं को फिक्टीशियस बता दिया गया है। यानी बिलिंग कंपनी का काम नियम के मुताबिक हो जाता है। हर डिवीजन 80 फीसद से अधिक बिलिंग होने का दावा तो करती है लेकिन उनमें फिक्टीशियस कनेक्शन हटाकर बताए जाते हैं। दरअसल इसका मकसद बिलिंग कंपनी को पूरा भुगतान कर उससे कमीशन कराना भर है। यह क्रम पिछले कई सालों से चल रहा है और कागजी कार्रवाई के नाम पर बकायेदारों से वसूली का दम भरा जरा रहा जबकि हकीकत में उसकी आड़ में कमीशनखोरी का खेल चल रहा है।

"दरअसल दो लाख छह हजार उपभोक्ता वे हैं जो खोजे नहीं मिल रहे हैं। इनमे कई हजार लोगों के खाते पहले ही फिक्टीशियस मिले थे और उन्हें बंद किया जाना था, मगर वह बंद नहीं हो पाए। लिहाजा कंप्यूटर दिखाई दे रहे हैं। हालांकि इनकी संख्या में कोई इजाफा नहीं हुआ है।"

आशुतोष कुमार

मुख्य अभियंता लेसा

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