Biker Died After Collision Between Him and  Zareen Khan Car

दि राइजिंग न्‍यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

महाराष्ट्र में लागू कानून मकोका के यूपी संस्करण यानी यूपीकोका को लेकर अपराधियों से ज्यादा नेताओं में संग्राम छिड़ गया है। प्रदेश की भाजपा सरकार अपराधियों पर शिकंजा कसने के लिए इस कड़े कानून को लागू करने की दलील दे रही है तो विपक्ष इसे विरोधियों को फंसाने वाला कानून करार दे रहा है। आलम यह है कि विधानसभा सदन में यूपीकोका को लेकर संग्राम छिड़ गया है। इसमें पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से लेकर बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी तक शामिल हैं जो यूपीकोका के खिलाफ दिखाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया से लेकर ट्विटर पर भी यूपीकोका को लेकर जंग छिड़ी हुई है। विधानसभा में भाजपा का बहुमत होने के कारण इसे वहां पर पास कराना आसान है लेकिन विधान परिषद में भाजपा विधायकों की संख्या कम होने के कारण वहां इसे पास कराना आसान नहीं दिख रहा है।

दरअसल प्रदेश में जघन्य और सुनियोजित अपराध पर अंकुश लगाने के मकसद से प्रदेश सरकार ने महाराष्ट्र की तर्ज पर प्रदेश में यूपीकोका कानून लाने जा रही है। इस कानून के तहत के कड़े प्रावधान किए गए हैं और पांच साल से आजीवन कारावास तक सजा का प्रावधान है। इसके साथ ही इसमें पांच लाख रुपये से लेकर पचास लाख रुपये तक जुर्माना तथा संपत्ति भी जब्त करने का प्रावधान है। सरकार इस कानून का मकसद अपराधियों पर सख्ती से अंकुश लगाना बताती है लेकिन विपक्षी इसे केवल विरोधियों को ठिकाने लगाने की साजिश भर करार दे रहे हैं। हालांकि प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह इस कानून के पक्ष मे दिखते हैं। उनके मुताबिक इससे पुलिस कहीं ज्यादा बेहतर व प्रभावी ढंग से कार्रवाई कर सकती है। यह पुलिस के लिए अचूक अस्त्र साबित हो सकता है। उनके मुताबिक बढ़ते सुनियोजित अपराधों को देखते हुए इस तरह के कठोर कानून की आवश्यकता है।

मगर विपक्षी दल इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी तो इसे राजनैतिक विद्वेष में इस कानून के बेजा इस्तेमाल की आशंका जता रही है। समाजवादी पार्टी के नेता प्रतिपक्ष राम गोविंद चौधरी ने तो इस कानून को अघोषित इमरजेंसी सरीखा करार दिया। उन्होंने कहा कि इमरजेंसी के दौरान भी इस तरह के कानून लागू किए गए थे और उसका मकसद केवल राजनैतिक विरोधियों पर शिकंजा कसना व दमन करना भर था। कांग्रेस के नेता सदन अजय लल्लू ने तो यूपीकोका कानून को डरावना करार दे दिया। उन्होंने कहा कि यह ऐसा कानून है जिसका दुरूपयोग जरूर होगा। वहीं भाजपा के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मोहसिन रजा ने कहा कि प्रदेश में अपराधियों पर लगाम लगाने के लिए यूपीकोका जैसे कानून की जरूरत है। इस कानून का बेजा इस्तेमाल न होने पाएं, इसके लिए भी व्यवस्था की गई है।

मंशा पर संदेह

यूपीकोका को लेकर प्रदेश सरकार भले ही तमाम दलील दे रही है लेकिन जानकारों के मुताबिक प्रदेश में पहले से ही ऐसे तमाम कानून हैं जिन्हें सख्ती से लागू किया जाएं और पुलिस सुधार किए जाएं तो अपराधों पर लगाम लगाई जा सकती है। वरिष्ठ अधिवक्ता के मुताबिक गैंगेस्टर एक्ट में भी जिलाधिकारी की संस्तुति आवश्यक होती है जबकि यूपीकोका में अब कमिश्नर की संस्तुति लेनी होगी। यानी कुल मिला प्रक्रिया पुरानी जैसी होगी। तमाम प्रकरणों में पुलिस द्वारा लगाए गए गैंगस्टर एक्ट के मामले कोर्ट में टिक नहीं पातें। वजह यह है कि पुलिस साक्ष्य तक बिना पहुंचे ही कार्रवाई कर देती है और फिर अदालत में उसे मुंह की खानी पड़ती है। अगर पुलिस के इंवेस्टीगेशन के तरीके में सुधार किया जाएं। अकाट्य साक्ष्य एकत्र किए जाएं तथा जांच तकनीकी परक हों तो ज्यादा बेहतर परिणाम सामने आएंगे। फिर किसी नए कानून की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। मगर प्रणाली सुधार के बजाए नए कानून लाने की कवायद सरकार की मंशा पर ही सवाल खड़े कर देती है।

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