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वाह रे आलू, किसान से उपभोक्ता तक बदल रहा रंग

| Last Updated : 2017-12-19 09:55:41

 

  • सरकार की उदासीनता से मुनाफाखोरों की चांदी
  • बेभाव पुराना आलू लेकिन बाजार में दस रुपये किलो

Conditions of Farmers in India


दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

प्रदेश में आलू इतना है कि किसान कीमत न मिलने के कारण उसे सड़क पर फेंकने को मजबूर हैं लेकिन दूसरा पक्ष यह है कि आम लोगों को आलू 12 से पंद्रह रुपये किलो के भाव मिल रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि आलू की ये कीमतें किसकी जेब में जा रही है। किसानों का जीवन स्तर ऊंचा करने की दलील देने वाले सरकार कहां है और लोगों  को सस्ता भोजन व साधन उपलब्ध कराने के दावे कहां खो गए हैं। पिछले दिनों जारी आंकड़ों के मुताबिक मुद्रा स्फीति की दर बढ़ गई है यानी महंगाई में इजाफा हुआ है लेकिन सरकार जीएसटी (गुड्स एंड सर्विस टैक्स) लगने के बाद सामान सस्ता होने की दलील देते नहीं थक रही है।

 

प्रदेश में आलू बेल्ट कहे जाने वाले आगरा, कानपुर देहात, मैनपुरी, फतेहपुर आदि क्षेत्रों में नया आलू पांच रुपये किलो के भाव बिक रहा है। कोल्ड स्टोरेज में रखे पुराने आलू की पचास किलो की बोरी 10-15 रुपये में मिल रही है यानी पचास पैसा किलो से भी सस्ती। जबकि कोल्ड स्टोरेज में एक बोरा आलू को रखने की कीमत ही सौ रुपये से अधिक है। यानी आलू को रखना ज्यादा महंगा साबित हो रहा है। इस कारण से किसान अब इसे फेंक रहे हैं। दूसरी ओर, बाजार में पुराना आलू आज भी दस रुपये किलो के भाव मिल रहा है।

सवाल यह है कि जब किसान आलू फेंक रहा है तो फिर मंडी में इतने भाव में कौन बेच रहा है। यही हाल नए आलू का है। नया आलू बाजारों में 12 से पंद्रह रुपये किलो चल रहा है जबकि फसल पैदा करने वाले किसान को बामुश्किल पांच रुपये किलो का ही भाव मिल रहा है। आलू का देखा देखी बाकी सब्जियों की कीमत किसान को बहुत कम मिल रही है लेकिन मंडी में पहुंचते ही उनके दाम तीन से पांच गुना तक बढ़ रहे हैं।

 

मुनाफाखोरों की चांदी

 

सरकार भले तमाम दावे करें लेकिन हकीकत में पूरा बाजार इस समय मुनाफाखोरों के हवाले हैं। खास बात रोजमर्रा का सामान व सब्जियां में तो मुनाफाखोरी जमकर चल रही है। किसान अपनी फसल की कीमत के लिए परेशान है लेकिन उसे बेचने वाले आढ़ती और व्यापारी मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। सरकार भी आंख मूंद कर तमाशा देख रही है। इस कारण लोगों की परेशानी बढ़ गई है। केवल सब्जियां ही नहीं, बाकी रोजमर्रा का सामान भी महंगा हो चुका है। दरअसल जीएसटी लगने तथा उसके बाद जीएसटी की दरों में बदलाव के बाद टैक्स छह से 12 फीसद तक कम हो गया लेकिन साबुन, तेल, चाय की पत्ती से लेकर कास्मेटिक्स आदि के दामों में कोई बदलाव नहीं हुआ। अलबत्ता कई कंपनियों ने टैक्स कम होने के बाद कीमतों में इजाफा कर दिया।

एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर्स गुड्स) एसोसिएशन के महामंत्री विनोद अग्रवाल के मुताबिक तमाम कंपनियों ने टैक्स कम होने के बाद कीमतें बढ़ा दी है। सरकार ने भले ही नई एमआरपी तय करने के निर्देश जारी किए हों लेकिन किसी भी कंपनी ने दाम कम नहीं किए। व्यापारी हो या उपभोक्ता दोनों ही इसका शिकार हैं। इतना जरूर है कि जहां पर बल्क सेल है या आपूर्ति है, वहां पर कुछ स्कीम देकर दामों के अंतर का लाभ दिया गया लेकिन उसमें उपभोक्ता ठगा जा रहा है।

 

प्रदेश में आलू उत्पादन करने वाले किसान परेशान हैं। किसानों का कोल्ड स्टोरेज में रखा पुरान आलू स़ड़ रहा है। कोल्ड स्टोरेज का भाड़ा कीमत से अधिक हो चुका है। नए आलू में भी बिचौलिए ही मुनाफा कमा रहे हैं जबकि उत्पादक को वाजिब कीमत तक नहीं मिल रही है। सरकार ने बिजली के दामों में इजाफा कर दिया है और कोल्ड स्टोरेज  का भाड़ा भी बढ़ गया है। इससे आक्रोश बढ़ता जा रहा है। जल्द ही आक्रोशित किसान बड़ा आंदोलन करेंगे।

हरिनाम सिहं वर्मा

भारतीय किसान यूनियन 



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