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दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

21 सितंबर – स्कूली वाहनों में अनिवार्य रूप से स्पीड गवर्नर लगाने के आदेश अपर परिवहन आयुक्त गंगाफल ने जारी किए। आनन फानन स्कूली की मीटिंग बुलाई गई। लगाकि स्कूल वाहनों पर कुछ लगाम लगेगी। मगर फिर इस बिना पर इसे टाल दिया गया क्योंकि वाहनों की फिटनेस में स्पीड गवर्नर की अनिवार्यता लागू नहीं है। पिछले दो साल में तीसरी बार जारी आदेश फिर फाइलों में दफन हो गया।

 

19 नवंबर 2016 – वर्ल्ड ट्रैफिक विक्टिम्स रिमेंमबरेंस डे पर राजधानी में हादसों के मद्देनजर ब्लैक स्पाट को चिन्हि करने तथा उन्हें सुरक्षित करने की घोषणा हुई। वाहन चालकों को जागरूक करने के लिए नियमित कैंपेन चलाने की बातें हुईं। मगर दिन गया बात गई। अधिकारी फंड के अभाव का रोना रोते रहें। यही हाल हाईवे पर गश्त तथा घायलों को त्वरित मदद मुहैया कराने के लिए इंटरसेप्टर खरीदने की बात हुई। यह बात माकूल थी सो इंटरसेप्टर तो आ गए लेकिन अब इंटरसेप्टर हाईवे पर दिखते हैं न उनके प्रभारी अधिकारी। केवल चालान के लिए इंटरसेप्टर इस्तेमाल हो रहे हैं। यही नहीं, एक जोन में एक इंटरसेप्टर के हिसाब से वाहन हैं। यानी इनके भरोसे उम्मीद बेमानी ही साबित हुई।

दरअसल उत्तर प्रदेश में हर साल होने वाले हादसों की संख्या एक लाख से ज्यादा हो चुकी है। मृतकों की संख्या पिछले 19 हजार पार गई थी और इस बार पहले दस महीनों में ही 17 हजार के ऊपर पहुंच चुकी है मगर परिवहन विभाग के दस्ते ओवरलोड वाहन पकड़ रहे हैं। खास बात यह है कि संगोष्ठी सेमिनार में हादसों की वजह गिनाने में परिवहन अधिकारी पीछे नहीं रहते हैं लेकिन किस बिंदु पर काम हुआ, इसका कोई जवाब किसी के पास नहीं रहता है। अधिकारी भी इसमें कई खेमे में बंटे दिखाई देते हैं। प्रवर्तन अधिकारी इसके लिए सड़क सुरक्षा इकाई को जिम्मेदार ठहराते हैं जबकि सड़क सुरक्षा इकाई के शाखा अधिकारी बिना प्रवर्तन दस्तों व प्रशासनिक इकाई के सहयोग के इसमें सफलता की उम्मीद बहुत कम बताते हैं। इससे सरकार की भी गंभीरता का अहसास हो जाता है कि सड़क हादसों में साल दर साल मौत का ग्राफ बढ़ने के बावजूद एक सड़क सुरक्षा इकाई को मुस्तैद नहीं किया जा सका।

वाहन ही नहीं अधिकारी भी ओवरलोड

 

अब जरा सड़क सुरक्षा इकाई पर गौर कीजिए। सड़क सुरक्षा आयुक्त पी गुरुप्रसाद हैं। वह परिवहन आयुक्त भी है और परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक भी। वैसे एक लिहाज से रोडवेज व परिवहन विभाग के संयुक्त प्रयास से सड़क सुरक्षा को प्रभावी ढंग से लागू कराया जा सकता है लेकिन हकीकत में रोडवेज की बसें ही बिना फिटनेस के दौड़ रही है। कमीशन के चक्कर में रोडवेज की बसों में भी स्पीड गवर्नर नहीं है जबकि इसके आदेश काफी पुराने हैं। टेंडर के जरिए स्पीड गवर्नर लगने हैं लेकिन इसके लिए मनमाफिक एजेंसी की तलाश ज्यादा शिद्दत से हो रही है। इसी तरह से अपर परिवहन आयुक्त सड़क सुरक्षा गंगाफल बाकी प्रशासन –पुलिस व विभागीय शाखाओं से सहयोग की कमी के कारण प्रभावी काम न होने पाने की बात कहते हैं। दूसरी तरफ प्रवर्तन शाखा की बात करें तो उनकी मेहरबानी से राजधानी में ही अवैध वाहनों की भरमार पूरे प्रदेश की दास्तां बयां कर देती है।

डेढ़ महीने से शासन में अटकी है फाइल

 

परिवहन आयुक्त कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक व्यावसायिक वाहनों (तिपहिया छोड़) तथा स्कूल वाहनों में स्पीड गवर्नर लगाने तथा फिटनेस में इसे अनिवार्य किए जाने का प्रस्ताव डेढ़ महीने से शासन में लंबित हैं। यह अलग बात है कि इन डेढ़ महीनों में करीब अस्सी से अधिक लोगों की मौत हादसों में हो चुकी है। इनमें पचास फीसद से ज्यादा मामले तेज रफ्तार के हैं। मगर परिवहन विभाग फिलहाल चैन से शासन से अनुमति मिलने का इंतजार कर रहा है।

फटकारके बाद जागरूकता दिखावा

 

सुप्रीम कोर्ट की फटकार लगने तथा तीस नवंबर को राज्य सरकार से जवाब तलब किए जाने के बाद प्रमुख सचिव परिवहन आराधना शुक्ला ने आननफानन हर बुधवार को हेलमेट –सीट बेल्ट की जांच के लिए विशेष अभियान चलाने की घोषणा कर दी। उन्होंने इसे वाहन चालकों को जागरूकता करने की कार्रवाई करार दिया है लेकिन सवाल यह है कि केवल हेलमेट –सीट बेल्ट से हादसे रुक जाएंगे। दलील दी जा रही है कि इससे कम से कम मौत कम होंगी। सवाल यह है कि इसके पहले विभाग ने यह सुध क्यों नहीं लीं। यही नहीं, बसों से लेकर सुरक्षित परिवहन की दलील देने वाले परिवहन मंत्री का अचानक ही एकदम से विमुख होना भी कई सवाल खड़े कर रहा है।

 

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