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दि राइजिंग न्‍यूज

लखनऊ।

 

जिस समय एटीएस ने राजधानी में संदिग्‍ध आतंकी सैफुल्‍लाह को मार गिराते हुए कई जनपदों में ताबड़तोड़ छापेमारी की थी तभी से यह अंदेशा लगाया जा रहा था कि आतंकी प्रदेश में दबे पांव अपना नेटवर्क फैला रहे हैं।  ताजा मामले में लखनऊ, गोरखपुर सहित तीन अन्‍य प्रांतों से 10 संदिग्‍ध आंतकियों को एटीएस ने गिरफ्तार किया है। इनका कनेक्‍शन गोरखपुर होते हुए नेपाल, कतर तक पहुंच गया है। गिरफ्तार हुए आरोपियों पर आतंकियों को फंड मुहैया कराने का आरोप लगा है। 

प्रदेश आतंकियों के लिए सॉफ्ट प्‍लेस बना हुआ है। यही कारण है कि समय-समय पर यहां आतंकी गतिविधि‍यां देखी जाती हैं। हालांकि इसे एटीएस की उपलब्धि ही कहा जाएगा कि बड़ी घटना होने के पहले ही इन आतंकियों को सुरक्षा कर्मियों ने या तो मार गिराया है या फिर गिरफ्तार करते हुए जेल भेज दिया। यदि बात की जाए केवल राजधानी की तो लोहिया पथ, जानकीपुरम, चिनहट, काकोरी, चौक सहित कई जगहों पर एटीएस और पुलिस ने कार्रवाई की है। जबकि प्रदेश में फतेहपुर, कानपुर, फैजाबाद, वाराणसी, उन्‍नाव, सीतापुर, गोरखपुर सहित दूसरे देश नेपाल तक इसका पूरा कनेक्‍शन चल रहा है। कभी आतंकियों को आर्थिक सहयोग करने या फिर आतंकियों को हथियार बेचने के कई मामले सामने आ चुके हैं।

कौन है इनका मददगार?

एटीएस और पुलिस ताबड़तोड़ घटनाओं में आतंकियों को सलाखों के पीछे भले ही ढ़केल रहीं हो, लेकिन इनके मददगारों तक उसके हाथ नहीं पहुंच पा रहे हैं। यही कारण है कि एक घटना होने के बाद अगली घटना के लिए आतंकियों का तंत्र काम करने लगता है। आइजी एटीएस की मानें तो उनकी नजर स्‍लीपर से लेकर सक्रिय सदस्‍यों तक बनी हुई है। जैसे ही कोई गतिविधियां संदिग्‍ध नजर आती है, तुरंत गिरफ्तार करते हुए मामले पर पड़ताल शुरू कर दी जाती है। हालांकि स्‍लीपर सेल से निपटना थोड़ा कठिन है, क्‍योंकि ये अदृश्‍य रूप में आतंकियों के लिए काम करते हैं। इसलिए पूर्व की घटनाओं को ध्‍यान में रखते हुए इनकी गहनता से पड़ताल की जाती है। 

इंटरनेट ने बनाया आसान-

आतंकियों को किसी भी देश में अपना काम करना बेहद आसान हो गया है, क्‍योंकि इंटरनेट के जरिए वह किसी से भी संपर्क बना सकते हैं। यह इसलिए भी सुरक्षित है, क्‍यों‍कि इंटरनेट का प्रयोग करने के बाद उसका डाटा भी हटाया जा सकता है। जिससे सुरक्षा एजेंसियों को ऐसे संदि‍ग्‍ध आतंकी पकड़ने में अतिरिक्‍त मेहनत करनी पड़ती है। फेसबुक, वॉट्सएप और अन्‍य सोशल साइट्स के माध्‍यम से ग्रुप बनाकर आसानी से सूचनाओं का अदान-प्रदान किया जा सकता है। अधिकतर आतंकी गतिविधयों में इंटरनेट ओर सोशल साइट्स की भूमिका महत्‍वपूर्ण पायी गयी है।

उल्‍लेखनीय है कि रविवार को एंटी-टेरर स्क्वॉड (एटीएस) ने आतंकी संगठनों को फंड मुहैया कराने वाले 10 मददगारों को गिरफ्तार किया है। इनमें से संजय सरोज, नीरज मिश्रा, साहिल मसीह, शंकर सिंह, मुकेश प्रसाद, मुशर्रफ अंसारी, सुशील राय, दयानंद यादव, नसीम अहमद और अरशद नईम शामिल हैं। यह आरोपी राजधानी के साथ प्रतापगढ़, बिहार और मध्यप्रदेश के रीवा के रहने वाले हैं। पाक से लश्कर-ए-तैयबा का एजेंट इंटरनेट के जरिए सीधे भारत में फाइनेंस का नेटवर्क चला रहा है। इन आरोपियों को एजेंट फर्जी नाम से खाता खोलने के लिए कहता और वहीं से मनचाही रकम उस खाते में भेज दी जाती थी। आइजी एटीएस ने बताया कि इसके एवज में कुछ धनराशि गिरफ्तार हुए एजेंटों को मिल जाता था। एटीएस को मामले पर 42 लाख फर्जी खातों से कई जानकारियां मिली हैं।

“आतंकियों के नेटवर्क को लगातार ध्‍वस्‍त किया जा रहा है। इसके लिए बीते दिनों कई गिरफ्तारियां भी की गई हैं। ताजा मामला 10 संदिग्‍ध आरोपियों की गिरफ्तारी का है। इनके ऊपर आतंकियों को फंडिंग करने का आरोप लगा है, क्‍योंकि पाकिस्‍तान के बैंक से ही 10 करोड़ रुपये से अधिक का लेन-देन हुआ है। पाकिस्‍तान के व्‍यक्ति की पड़ताल की जा रही है। देश के अंदर मौजूद उनके अन्‍य नेटवर्क को भी खंगाला जा रहा है। हमारी टीमें आरोपियों के फोन, सोशल साइट्स की गतिवि‍धियों आदि की गहनता से पड़ताल कर रही हैं।”

असीम अरुण

आइजी एटीएस

 

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