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फट गए घटिया जूते, फंस गए अफसर

Rising At 8am | 05-Apr-2018 | Posted by - Admin
  • 266 करोड़ रुपये हुए खर्च

  • अफसरों का कलंक सरकार के माथा

  • अदालत ने तलब किए टेंडर प्रक्रिया के दस्तावेज

   
Case of Poor Quality Shoes and Socks Distributed to Students of Government School

दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को सरकार द्वारा दिए गए जूते चार महीने भी नहीं चलें। चार महीनों में ही जूतों का दम निकल गया। बच्चों के जूते फट गए हैं। भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस के कसीदे पढ़ने वाली प्रदेश सरकार अब बच्चों को घटिया जूते दिए जाने के मामले में  बैकफुट पर है। शासन में बैठे अफसरशाहों ने एक बार फिर खेल कर दिया और सरकार की किरकिरी हो रही है। एक तरफ सरकार स्कूल चलो अभियान चला रही है तो दूसरी तरफ विपक्ष सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर सक्रिय है।

यह मामला इसलिए भी गंभीर हो गया है, क्योंकि इस प्रकरण पर कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। आगामी 11 अप्रैल को सरकार ने जूतों की खरीद से संबंधित सारे दस्तावेज तलब किए हैं। खास बात यह कि प्रकरण को स्वतः संज्ञान में लेते हुए कोर्ट ने एक नेक योजना के इस हश्र को स्तब्ध करने वाला करार दिया। इसके पहले सर्दियों में स्कूली बच्चों को स्वेटर वितरण में भी टेंडर में गड़बड़ी देखने को मिली थी, जिसके बाद टेंडर रद्द कर कमेटी बनवा कर बच्चों को स्वेटर बांटे गए थे।

दरअसल, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले करीब 1.54 करोड़ बच्चों को जूते देने की योजना सरकार ने बनाई थी। इसके ऊपर करीब 266 करोड़ रुपये व्यय किए गए। उसके बाद करीब चार महीने पहले ही स्कूलों में बच्चों जूते बांटे गए थे। प्रदेश भर में बच्चे जूते मिलने से खुश थे। मगर सरकार द्वारा दिए गए जूते चार महीने भी नहीं चले। राजधानी में कई स्कूलों में बच्चे फटे जूते पहन कर पहुंच रहे हैं। खास बात यह जूतों की घटिया क्वालिटी को लेकर हमलावर हो गया। इस संबंध में जनहित याचिका भी हो गई।

मामले के तूल पकड़ने के साथ ही इसकी पर्तें भी खुलने लगीं। खास बात यह है कि स्कूलों में जूते की सप्लाई का काम तमाम ऐसे लोगों को मिल गया, जिन्होंने इस तरह का काम कभी किया ही नहीं था। सूत्रों के मुताबिक टेंडर में सप्लाई का ज्यादा काम उस फर्म को मिला जो बिजली विभाग में काम करती रही है, लेकिन सेटिंग के जरिए पचास फीसद से ज्यादा काम उसी को मिल गया। खास बात यह रहा कि इस पूरी आपूर्ति में कोई जूता बनाने वाली बड़ी कंपनी को नहीं मिला। जिन कंपनियों ने जिन जूते की सप्लाई की, उनकी क्वालिटी बेहद घटिया थी। लिहाजा कुछ महीनों में ही जूते फट गए।

अफसरशाह कर गए खेल

सरकार भले ही भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मियों को जेल भेजने का दम भर रही हो, लेकिन जूतों की सप्लाई में शासनस्तर तक व्याप्त भ्रष्टाचार बेनकाब हो गया है। सबसे बड़ी बात है कि इतना बड़ा टेंडर हुआ तो उसकी कुछ शर्तें जरूर रही होंगी और गुणवत्ता की जांच भी हुई होगी। ऐसे में इतने घटिया जूते कैसे आपूर्ति किए गए, यह अपने आप में सवाल बन गया है। यही नहीं, जिन कंपनियों ने जूतों की सप्लाई की है, उनका इस क्षेत्र में क्या अनुभव रहा है, इसे लेकर भी अधिकारी गोलमाल जवाब देते नजर आते हैं। विभागीय अधिकारी से लेकर मंत्री तक इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं।

उधर, इस प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए न्यायालय ने सरकार ने इस पूरे टेंडर की प्रक्रिया तथा खरीद संबंधी सारे दस्तावेज तलब कर लिए हैं। बच्चों के लिए बनी इस महत्वाकांक्षी योजना के इस हश्र पर सख्त न्यायालय में सरकार के सचिव स्तर के अधिकारी को समस्त दस्तावेजों के साथ तलब किया है।

क्या पहले फिक्स था टेंडर?

सूत्रों के मुताबिक सरकारी स्कूलों में जूतों की आपूर्ति का पूरा टेंडर पहले से ही फिक्स हो चुका था। इसमें बिजली विभाग में काम करने वाली एक कंपनी व उससे जुड़े लोग काफी समय पहले ही सक्रिय हो गए थे। यही कारण था कि जूतों की आपूर्ति के लिए टेंडर में जूता निर्माण से जुड़ी कंपनियों की जगह उन्हें टेंडर मिल गया। जबकि प्रदेश के आगरा-कानपुर चमड़ा व जूता उद्योग के गढ़ माने जाते हैं। बावजूद इसके किस तरह से बाहरी लोगों को आपूर्ति का ठेका मिला, यह अपने आप में सवाल बन गया है। यही नहीं, इस पूरे टेंडर और आपूर्ति के तार सीधे शासन तक जुड़े दिखते हैं। वजह है कि टेंडर फाइनल होने से लेकर भुगतान तक में शासनस्तर के अधिकारी शामिल हैं।

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