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दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

दिल्ली सहित कोलकाता और अन्य राज्यों से आने वाले टैक्सचोरी माल पर लगाम लगाने के सरकार के दावे फिलहाल हवा में दिखाई दे रहे हैं। खास बात यह है कि करोड़ों रुपये के टैक्सचोरी के मामले माल की बरामदगी और उसके बाद चंद एजेंटों के नाम पर माल को मुक्त करने वाले अधिकारी पहले तो पहली अप्रैल से ई-वे बिल लागू होने पर इस अंकुश लगाने का दावा करते रहें, लेकिन अब रेलवे में भी ई-वे बिल की जरूरत केवल डिलीवरी के वक्त तथा पार्सल की कीमत पचास हजार से रुपये से अधिक होने पर ही होगी। यह बात जीएसटीएन पोर्टल पर भी दर्ज है। यानी कि टैक्सचोरी पर किसी तरह की लगाम लग पाएगी, यह भी अपने आप में सवाल बन गया है।

दरअसल, पिछले दिनों वाणिज्यकर विभाग द्वारा चारबाग रेलवे स्टेशन पर छापा मारकर करोड़ों रुपये का टैक्सचोरी का माल बरामद किया गया था। यह सारा माल बिना प्रपत्र तथा बिल के था। कई दिन तक चली मशक्कत और जुगाड़ के बाद सारा माल एजेंटों के नाम पर बने बैंक ड्राफ्ट–जुर्माने के आधार पर छोड़ दिया गया। खास बात यह है कि यह पूरा कुछ एजेंट के जरिए हुआ और चंद बैंकों के ड्राफ्ट पर ही जुर्माना–टैक्स का भुगतान कर माल छुड़ाकर बाजारों में पहुंच गया। पांच करोड़ रुपये से अधिक के माल में वाणिज्य कर विभाग एक भी व्यापारी तक नहीं पहुंच सका।

 

 

खास बात यह रही है कि सारा मामला सामने तथा तीन एजेंट के सामने आने की बात स्वीकार करने के बावजूद अपर आयुक्त वाणिज्य कर (ग्रेड टू) एके राय इस संबंध में पहली अप्रैल से ई-वे बिल लागू होने पर इस पर लगाम लगाने का दावा करते रहें, लेकिन हुआ कुछ नहीं। अब ई-वे प्रणाली लागू हो गई है, लेकिन इसमें भी रेलवे में ई-वे बिल केवल डिलीवरी के बिल आवश्यक है। यानी कि माल के साथ ई-वे बिल की आवश्यकता नहीं है।

केंद्र सरकार से लेकर प्रदेश सरकार तक राजस्व चोरी पर अकुंश लगाने के लिए दावे जरूर कर रही है, लेकिन हकीकत में इस पर रोक लगाने के लिए कोई व्यवस्था किसी के पास नहीं है। खास यह है कि करोड़ों रुपये का माल पकड़े जाने के बाद कुछ दिन तो चारबाग स्टेशन पर कुछ सख्ती नजर आई, लेकिन उसके बाद फिर सारा मामला ढर्रे पर लौट आया। अब तो पहले कहीं ज्यादा माल की आपूर्ति हो रही है। सारा माल पार्सल घर से निकलकर बाजारों में पहुंच रहा है और इसके एवज में अधिकारी से लेकर एजेंट तक अपनी जेब भर रहे हैं।

 

 

बुकिंग में ही खेल

रेलवे के जरिए टैक्स चोरी का खेल बहुत सुनियोजित तरीके से चल रहा है। खास बात यह है कि रेलवे की बुकिंग के लिए जीएसटीएन का उपयोग हो नहीं रहा है या फिर फर्जी नंबर इस्तेमाल हो रहे हैं। लीज होल्डर पार्सल और कूरियर के नाम पर करोड़ों रुपये का माल दूसरे राज्यों से ला रहे हैं। यहां पर पार्सल की कीमत कम आंक कर उन्हें बिना ई-वे बिल छुड़ाकर गोदामों तक पहुंचा दिया जाता है। इसमें अंडर बिलिंग का धंधा भी जमकर हो रहा है और इसका मुनाफा रेलवे के अधिकारियों से से लेकर स्टेशन पर तैनात सुरक्षा अधिकारियों तक पहुंच रहा है। लिहाजा, इन पर कार्रवाई भी आसानी से नहीं हो पा रही है।

उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार मंडल के वरिष्ठ महामंत्री अमरनाथ मिश्रा भी कहते हैं कि रेलवे में बुकिंग के समय जीएसटीएन क्यों नहीं लिया जाता, यह अपने आप में सवाल है। ट्रांसपोर्टर के यहां माल पहुंचते ही उस पर तमाम नियम लागू हो जाते हैं, लेकिन रेलवे में ऐसा नहीं है। इसी वजह से रेलवे स्टेशनों पर एक समानान्तर व्यवस्था चल रही है।

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