Irrfan Khan Writes an Emotional Letter About His Health

दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल  

लखनऊ।


राजधानी सहित कई राज्यों में पेट्रोल पंप पर एक चिप के जरिए डीजल व पेट्रोल की घटतौली से तो आप वाकिफ होंगे। मगर यह जानकार हैरानी जरूर होगी, बाजार में लगभग हर जगह इसी तरह से तकनीकी का इस्तेमाल कर जनता के  टैक्स को हड़प किया जा रहा है। होटल, रेस्त्रां और बड़ी बड़ी दुकानों पर बिलिंग काउंटर पर अपने तमाम कंप्यूटर और बिल प्रिंट जरूर लिए होंगे लेकिन इन कंप्यूटर की आड़ में बड़े पैमाने पर खेल चल रहा है।


दरअसल, बिलिंग के लिए लगे कंप्यूटर ही वास्तविक व्यापार में लगभग आधा हजम कर जाते हैं। चौकिंए नहीं, यह वास्तविकता है। दरअसल अधिसंख्य कारोबारी अपने टर्नओवर को कम दिखाने के लिए कंप्यूटर में बिलिंग का सॉफ्टवेर का इस्तेमाल कर रहे हैं। निजी एजेंसियों द्वारा विकसित इन सॉफ्टवेर के जरिए पूरी बिलिंग फेक (फर्जी) होती है। आभास भले ही सब कुछ ठीक होने का लगे लेकिन वास्तविकता यही है, यह प्रतिष्ठान बंद होने के समय या फिर बाद में संचालक द्वारा टर्नओवर केवल उतना कर दिया जाता है, जितना की टैक्स रिटर्न में दिखाया जा रहा है। बाकी का सारा डाटा डिलीट कर दिया जाता है। 


राजधानी में ही इस तरह का सॉफ्टवेर विकसित करने वाले करीब आधा दर्जन कंपनियां काम कर रही है। चार –पांच साल पहले तक तीन –चार हजार में रुपये में बिलिंग सॉफ्टवेर बेचने वाली ये एजेंसियां अब मनमाना शुल्क वसूल रहीं हैं। कारण है कि इनके सॉफ्टवेर से डेटा रिकवरी केवल इनके माध्यम से की जा सकती है जबकि टैली जैसे सॉफ्टवेर में यह डाटा रिकवर हो जाता है। इस कारण से व्यापारियों को भी इन निजी कंपनियों के सॉफ्टवेर का इस्तेमाल कर रहे हैं।


जीएसटी का सॉफ्टवेर तैयार


देश में गुड्स एंड सर्विस टैक्स भले ही पहली जुलाई से लगना है लेकिन कंपनियों ने बिलिंग सॉफ्टवेर अभी से तैयार कर लिया है। उसके लिए पंद्रह हजार रुपये से बीस हजार रुपये वसूले जा रहे हैं। इसके अलावा वार्षिक रखरखाव (एएमसी) के लिए तीन से चार हजार रुपये का पैकेज दिया जा रहा है। दरअसल सारा खेल जीएसटी लगने से पहले ही टर्नओवर को सीमित रखने की कवायद का है।


हर क्षेत्र में हो रहा है इस्तेमाल


बिलिंग सॉफ्टवेर तैयार करने वाली करीब एक दर्जन निजी कंपनियां राजधानी में चल रही हैं। पिछले पांच सालों में कई ने अलग अलग क्षेत्रों में महारत तक हासिल कर ली है। मसलन होटल –रेस्त्रां में बिलिंग सॉफ्टवेर देने वाली कंपनी अलग, रोजमर्रा का सामान बेचने वालों के लिए अलग तो रेडीमेड वस्त्रकारोबारियों का टर्नओवर देखने वाली कंपनी अलग। वजीर हसन रोड, अमीनाबाद मेडिकल मार्केट, कुर्सी रोड, हजरतगंज, इंदिरानगर आदि कई इलाकों में ये सॉफ्टवेर कंपनियां काम कर रही है।


तकनीकी बन गई वसूली का साधन


वैट (मूल्य संवर्द्धित कर प्रणाली) लागू होने से पहले व्यापारियों के यहां बिल बुक ही चलती थीं। बिल बुक के चलते टैक्स चोरी भले हो जाए लेकिन टर्न ओवर कम करके दिखाना मुश्किल होता था। उसका कारण था कि बिल बुक के हर पन्ने पर सीरियल नंबर होता था। पन्ना गायब होता था तो वह अपने आप संदिग्ध हो जाता था। मगर कंप्यूटर में ऐसा कुछ है ही नहीं। कंप्यूटर में केवल डिलीट भर करना है, सारा डाटा नष्ट हो जाता है। यही नहीं, कंप्यूटराइज कैलकुलेटर से मिलने वाले बिल की स्याही भी दो हफ्ते में अपने आप उड़ने लगती है। यानी साक्ष्य गायब।

 

"कैलकुलेटर व कंप्यूटर से होने वाली बिलिंग में ऐसे सॉफ्टवेर इस्तेमाल करने की जानकारी आती है। देखा जाए तो इसी तरह के शक के आधार पर ही विशेष अनुसंधान इकाई द्वारा छापेमारी की जाती है। बड़ी टैक्स चोरी पकड़ी भी गई है। ये साफ्टवेयर कंपनियां कैसे साफ्टवेयर बना रही हैं और उनकी क्या अहमियत है, इसकी जांच कराई जाएगी। आवश्यकता पड़ी तो इसमें पुलिस या एसटीएफ की मदद ली जाएगी।""

डा. बुद्धेश मणि

अपर आयुक्त वाणिज्य कर

 

"यह प्रकरण टैक्स की चोरी से जुड़ा हुआ है। इसमें पुलिस की कोई भूमिका नहीं रहती है। अगर इस तरह की हाईटेटक तरीके से टैक्स की चोरी किए जाने की जांच कराने के लिए दिशा निर्देश आएंगे तो जांच कर ऐसी कंपनियों का पकड़ा जाएगा।"

 

अमित पाठक

एसएसपी एसटीएफ


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