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दि राइजिंग न्यूज

सैफई/लखनऊ

 

मृत्यु शैया पर अंतिम सांस गिनती मां के लिए मंदिरों में भगवान के समक्ष औलादों को विलाप करते और फिर भगवान को चमत्कार करने के कई सीन आपने फिल्मों में जरूर देखे होंगे लेकिन यह बात धरती के भगवान कहे जाने वाले चिकित्सकों के आगे बेमानी ही साबित होती है। यहां तो मृत्यु शैया पर पड़ी मां को बचाने के लिए एमबीबीएस का छात्र चिकित्सकों से दरयाफ्त करता रहा लेकिन डाक्टर नहीं पसीजे। यही नहीं, ब्लड डोनर होने का कार्ड दिखाने वाले छात्र को चिकित्सकों ने खून का कारोबारी तक करार दे दिया। इस विवाद में छात्र की मां की मौत हो गई।  

मामला मुलायम सिंह यादव के गाँव सैफई में स्थित राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान का है। औरैया जिले के महाराजगंज गाँव निवासी दिग्विजय सिंह RML आयुर्विज्ञान संस्थान सैफई में MBBS प्रथम वर्ष के छात्र हैं । उन्होंने ने बताया कि 14 सितंबर को उनकी मां मनीषा देवी की तबीयत अचानक ख़राब हो गई जिसके बाद उन्हें आरएमएल संस्थान में ही भर्ती कराया गया। जाँच में पता चला उनको डेंगू हुआ था। 15 सितंबर को उनको ब्लड की जरूरत पड़ी तो कुछ साथी छात्र संस्थान के ही ब्लड बैंक में अपना ब्लड डोनेशन कार्ड लेकर पहुँचे। लेकिन ब्लड बैंक से यह कहते हुए उन्हें भगा दिया गया कि "तुम लोग ब्लड बेचते हो ! पहले साबित करो कि ये तुम्हारी माँ ही है।" इसी बीच दिग्विजय की माँ का खून की कमी से मौत हो गया। मनीषा देवी के मौत के बाद जब छात्र खून ना दिए जाने की शिकायत लेकर वीसी के पास पहुँचे तो वीसी ने अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए उन्हें भगा दिया व छात्रों को डिटेन कर देने की धमकी भी दे डाली। जिसके बाद वीसी को बर्खास्त करने की मांग करते हुए संस्थान के लगभग 700 छात्र हड़ताल पर चले गए व प्रदर्शन करने लगे। यह हड़ताल अभी जारी है लेकिन शासन-प्रशासन चुप्पी साधे हुए है।

दूसरों की जिंदगी बचाने के करते हैं नियमित रक्तदान

 

आंदोलन कर रहे MBBS तृतीय वर्ष के छात्र रिषभ सोनकर बताते हैं कि मेडिकल छात्र हर 6 महिने में एक बार रक्तदान करते हैं लेकिन स्वयं की जरूरत पड़ने पर ही जब उन्हें रक्त नही मिल पा रहा है तो छात्रों का आक्रोशित होना स्वाभाविक है। यहां प़ढ़ने वाले कई छात्र भी उनकी तरह से समय समय पर रक्तदान करते हैं ताकि खून की कमी से किसी की जान न जाने पाएं। मगर ऐसा करने का जो सिला मिला है, उससे तो अब घृणा होने लगी है।

कुलपित की ऊंचे जलाल में झुलसे मरीज

 

2005 में जब मुलायम सिंह यादव की सरकार बनी तो मुलायम सिंह यादव का एक सपना था कि एक ऐसे अस्पताल की सैफई गाँव में नींव रखी जाए जिससे गरीबो को मुफ्त दवा और इलाज मिल सके जिससे आस पास के जिले के लोग इसका फायदा ले सके। इसके प्रथम निदेशक डॉक्टर टी प्रभाकर बनाये गये।

 

बताया जाता है कि मुलायम सिंह यादव जब देश के रक्षा मंत्री बने थे, तब डॉक्टर टी प्रभाकर की उनसे मुलाकात हुई थी और मुलायम सिंह यादव ने ही अपने गाँव के सपने को पूरा करने की जिम्मेदारी डॉक्टर टी प्रभाकर को सौंपी थी। जब जब सपा की सरकार सत्ता में आती थी टी प्रभाकर को ही उच्च पद  पर बैठाया जाता था। बसपा सरकार में टी प्रभाकर के बाद कई निदेशक भी आये और चले गए।

 

2012 में अखिलेश यादव की सरकार आते ही टी प्रभाकर को निदेशक बना दिया गया और बाद में 2016 में संस्थान को विश्वविद्यालय का दर्जा मिलते है प्रथम कुलपति के रुप मे टी प्रभाकर की नियुक्ति हो गई। प्रथम कुलसचिव के रूप में जितेंद्र प्रताप सिंह की नियुक्ति हुई और कुलपति ने उनको अपने सामने बौना साबित कर दिया लेकिन जितेंद्र प्रताप सिंह भी ईमानदार पृवत्ति के अधिकारी थे और सितंबर 2016 को नर्सिंग स्टॉफ परीक्षा में कोरी कापियों को पकड़ कर कुलपति को पहला झटका दिया था। बाद में परीक्षा निरस्त हुई और कुलसचिव का तबादला करा दिया गया।

उसके बाद से विश्वविद्यालय की बदहाली का दौर। संस्थान में भ्रष्टाचार का नमूना पिछले दिनों भी देखने को मिला था जब मलेरिया की दवा ना होने कि पोल खुलने पर कुलपति द्वारा डॉक्टर विजय वर्मा के साथ भी गाली गलौज और बदतमीजी की गई। जिसकी शिकायत विजय वर्मा द्वारा लिखित रूप से दी गयी थी लेकिन उसे दाखिल दफ्तर करा दिया गया।  पिछले कई दिनों से मेडिकल छात्र अपने साथी दिग्विजय सिंह को इंसाफ दिलाने के लिये हडताल पर बैठे हैं लेकिन  कुलपति के कानो में ज़ू तक नही रेंग रही है।

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