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दि राइजिंग न्यूज़

संजय शुक्ल

लखनऊ।


गुड्स एंड सर्विस टैक्स लागू भले ही जुलाई से होना है लेकिन इसे लेकर व्यापारियों की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। खास कर वे व्यापारी जो संपन्न हैं और जिनका टर्नओवर भी खासा बड़ा है। मगर जीएसटी के प्रारूप में टैक्स चोरी को रोकने के बजाए उसे प्रोत्साहन ज्यादा मिलता दिख रहा है। अब जब टैक्स की दरें 18 व 28 फीसद होंगी तो टैक्स चोरी के लिए माल लाने वाले कारोबारियों का मुनाफा भी उसी के सापेक्ष में बढ़ेगा। मोटे मुनाफे की इस गणित में जीएसटी किस तरह प्रभावी हो जाएगा, यह अपने आप में अहम सवाल बन गया है।


अब जरा वर्तमान स्थितियों पर गौर करें। वर्तमान में रेडीमेड, सुपारी,किराना आदि पांच फीसद टैक्स के दायरे में हैं लेकिन पूरे देश में इनका समानान्तर बाजार चल रहा है। दिल्ली से मुंबई, पंजाब तक कच्चे-पक्के बिलों का खेल कहीं छिपा नहीं है। कारण है कि बिना टैक्स के माल का टैक्स व्यापारियों की जेब में पहुंच रहा है। टैक्स अधिवक्ताओं के मुताबिक वर्तमान में वाणिज्य कर से सरकार को करीब 53 हजार करोड़ रुपये राजस्व मिल रहा है जबकि वास्तविकता में उसके डेढ़ गुना यानी करीब 75 हजार करोड़ रुपये टैक्स की चोरी हो रही है। इस टैक्स चोरी में जिम्मेदार विभागों के अधिकारी भी पूरी तरह से शामिल हैं।


बिलिंग साफ्टवेयर बनेंगे हथियार


रोजमर्रा के सामान से लेकर दवा, मोबाइल –इलेक्ट्रानिक्स, होटल-रेस्त्रां, टाइल्स –सिनेट्री, सोना-जेवर आदि सभी बाजारों में निजी कंपनियों के बिलिंग साफ्टवेयर काम कर रहे हैं। यानी यहां पर बिलिंग निजी साफ्टवेयर से हो रही है और इन साफ्टवेयर की खासियत यह है कि इनके जरिए वास्तविक कारोबार को सहजता से डिलीट यानी रफा दफा किया जा सकता है। यानी वास्तविक कारोबार डिलीट हो जाता है औऱ मुनाफा व्यापारी की जेब में पहुंच जाता है जबकि वास्तविक कारोबार केवल वह रहता है, जो कंप्यूटर में दिखाई देता है। बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी का मंत्र इसी निजी कंपनियों के साफ्टवेयर में छिपा है जो सरकार के काबू के बाहर हैं।


प्रावधान बनेंगे सहायक


जीएसटी के अंतर्गत पचास हजार रुपये तक के माल को बिल से मुक्त रखा गया है। ई-वे फार्म पर अभी भी सरकार कोई फैसला नहीं कर सकी है। इसका सीधा फायदा मोबाइल, इलेक्ट्रानिक्स, बिसातखाना (कास्मेटिक्स), कपड़ा आदि पर कारोबारियों को मिलेगा। जब दूसरे प्रदेश से इन्हें इंट्री मिल जाएगी तो उसे फिर आसानी से बेचा जा सकेगा। इसमें प्रावधान का यह फायदा मिलेगा कि अंतिम चरण के व्यापारी का व्यापारी आईटीसी (इनपुट टैक्स क्रेडिट) क्लेम नहीं कर सकेगा लेकिन बदले में उसे उत्पाद पर लगने वाला टैक्स मुनाफे के तौर पर मिल जाएगा। ऐसे में जीएसटी लगने के बाद समानांतर यानी बिना बिल –पर्चे के कारोबार को प्रोत्साहन मिलना लाजिमी है।


स्टेशनरी कारोबारी जितेंद्र चौहान के मुताबिक स्टेशनरी के तमाम उत्पाद कलर, जेल इंक, अच्छे पेन, स्ट्रेपलर, पिन जैसे तमाम उत्पाद 28 फीसद टैक्स के दायरे में रखे गए हैं। सवाल यह है कि बाजार में बिल पर माल मंगाने पर व्यापारी प्रतियोगिता में बामुश्किल तीन –चार टका मुनाफा कमा पाता है जबकि टैक्स चोरी से माल लाने पर टैक्स तो सीधे उसकी जेब में पहुंचेगा। जबकि उपभोक्ता को सामान पर अंकित दाम देना होगा। फिर इससे राजस्व कैसे बढ़ेगा और लोगों को फायदा कैसे मिलेगा, यह अपने आप में संदिग्ध है।


ऐसे ही नहीं है व्यापारियों का विरोध


उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार मंडल के संसदीय महामंत्री अमरनाथ मिश्र का कहना है कि जीएसटी का पूरा प्रारूप अधिकारियों ने अपने हिसाब से तय किया है और इसका मकसद कुछ खास लोगो के हितों को संरक्षित करना था। यही कारण है कि इसमें व्यापारियों से कोई राय ली ही नहीं गई। वहीं अब देखने को मिल रहा है कि बड़े व्यापारी इस व्यवस्था में असहज महसूस कर रहे हैं जबकि जो पहले ही बिना टैक्स का कारोबार कर रहे थे, उन कोई फर्क नहीं है।


कपड़ा कारोबारी भी असमंजस में


जीएसटी में कपड़े पर टैक्स लगने के बाद सबसे ज्यादा परेशान कपड़ा –साड़ी कारोबारी हैं। दरअसल अभी तक कपड़ा टैक्स मुक्त था लेकिन अब इस पर भी टैक्स लगाया जा रहा है। अभी कपड़ा कारोबारियों पर टैक्स न लगने के कारण वह प्रक्रिया से भी अनभिज्ञ हैं और ऐसे में उनकी परेशानी बढ़ गई है। व्यापार मंडल के महामंत्री उत्तम कपूर बताते हैं कि कपड़ा कारोबारी इस तरह से टैक्स लेंगे, इसका ज्ञान तक नहीं है। उस पर टैक्स किस तरह से लगेगा या उस पर आईटीसी क्लेम कैसे होगा, उस बारे में कोई जानकारी बहुत कम है।


वहीं लखनऊ कपड़ा कमेटी के अध्यक्ष अशोक मोतियानी के मुताबिक कपड़ा कारोबारी बहुत छोटी –छोटी दुकानें करते हैं। उनका व्यापार सीमित हैं। अब जब कपड़े पर टैक्स लगाया जा रहा है तो ऐसे छोटे व्यापारियों के लिए उस पर टैक्स वसूला और फिर रिटर्न देना किसी बड़ी परेशानी की तरह से हैं। इसका पूरे देश में विरोध चल रहा है और कपड़ा कारोबारी इससे आक्रोशित हैं।


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