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नोटों से रंगीन हाईवे

            
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  • परिवहन विभाग के जांच अधिकारियों की करतूत दे रही गवाही
  • हर महीने सड़क पर होती है दो से तीन अरब की वसूली

case of corruption in making roads and black money

दि राइजिंग न्यूज़

संजय शुक्ल

लखनऊ।


क्या आप ने सुना है कि हाइवे पर सड़क का डामर नोटों से रंगीन होता है। अगर नहीं तो परिवहन विभाग के अधिकारियों को ही देंखें। चंदौली के अरबपति एआरटीओ आरएस यादव तो आजकल चर्चा में है ही। वैसे इसके पहले कानपुर और मेरठ की दो महिला अधिकारी से भी स्याह रात में हाईवे के खेल के साक्ष्य मिल चुके हैं। वसूली का ये सिंडीकेट इतना प्रबल है कि सरकार भले किसी की भी हो, लेकिन यह खेल बदस्तूर जारी रहता है।


प्रदेश, जिला और शहर हर जगह से गुजरने वाला हाईवे नीलम हो चुका है। इतना जरूर है कि अपनी मुस्तैदी दिखाने के लिए परिवहन विभाग समय समय पर अभियान चलाकर वाहनों को पकड़ने की रस्मअदायगी भी करता है लेकिन ज्यादातर वाहन वे होते हैं, जिनसे पैसा नहीं मिलता या फिर वह सिंडीकेट के बाहर के होते हैं।


परिवहन विभाग के सूत्रों के मुताबिक प्रदेश में हर दिन करीब एक से सवा लाख लाख ट्रक दूसरे राज्यों से आते हैं। बार्डर से इन ट्रकों के प्रवेश करने से पहले ही इन ट्रकों का सौदा हो जाता है यानी वाट्सएप या किसी कोड के जरिए उनके नंबर प्रदेश के परिवहन अधिकारियों तक पहुंच जाते हैं। यानी गंतव्य तक निर्विध्न ट्रक के पहुंचने की व्यवस्था। ट्रक के सुरक्षित माल उतारने तक की गारंटी परिवहन अधिकारी देते हैं और एवज में हर महीने की संख्या के मुताबिक उनका शुल्क पहुंच जाता है। इस पैसे की बंदरबाट जिले के अधिकारियों से लेकर मुख्यालय तक बैठे आलाधिकारियों में होती है। यही कारण है कि मुख्यालय पर चाहे जितनी शिकायत की जाएं, मगर विभाग उसे संज्ञान में नहीं लेता है।


प्रवर्तन कुर्सी की बोली


परिवहन विभाग में जांच या यानी प्रवर्तन स्क्वायड में एआरटीओ से लेकर सिपाही तक की तैनाती के लिए बोली लगती है। इसमें सबसे ज्यादा दाम दिल्ली बार्डर, बिहार बार्डर से सटे जिले हैं। उसके बाद वे जिले आते हैं जहां से खदान का माल निकलता है। यानी खनन उत्पाद लेकर निकलने वाले वाहन। झांसी से लेकर कानपुर तक यही सिंडीकेट काम करता है। खास बात यह है कि इसके लिए ट्रांसपोर्टर व परिवहन विभाग के अधिकारियों के कारखास ने ही इंट्री तय कर रखी है। प्रदेश में पिछले दिनों खनन पर रोक लगा दी गई थी, तो वाहन का आवागमन कम हो गया था लेकिन अब व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर है। आरटीओ दफ्तर के बगल स्थित ट्रांसपोर्ट नगर की पार्किंग में खड़े ओवर लोड ट्रक इसके साक्षात प्रमाण हैं।


कमाई के होड़ में बदहाल ट्रैफिक

 

जिलों में तैनात प्रवर्तन अधिकारियों की कमाई की होड़ में ही कई शहरों में यातायात व्यवस्था को बदहाल कर दिया है। कारण है कि शहर में यातायात नियंत्रण व अवैध वाहनों पर कार्रवाई के बजाए अधिकारियों को हाईवे पर जांच ज्यादा भाती है। इस कारण से राजधानी लखनऊ सहित तमाम शहरों में प्रवर्तन दरकिनार हो चुका है। परिवहन अधिकारी यहां पर संचालित होंने वाले अवैध वाहनों से वसूली कर रही रहे हैं, प्रवर्तन के नाम पर केवल हाईवे पर वसूली हो रही है।


कुएं में भांग

चंदौली के एआरटीओ आरएस यादव के पकड़े जाने के बाद करोड़ों की वसूली का पर्दाफाश हुआ है लेकिन सवाल यह है कि ये पिछले डेढ़ दशक से वाराणसी, मिर्जापुर –चंदौली में ही कैसे पोस्टिंग पा रहे थे। सूत्रों के मुताबिक केवल आरएस यादव ही नहीं, बल्कि इसी तरह के करीब एक दर्जन एआरटीओ व पीटीओ दशकों से एक ही जिले –मंडल में जमे हैं।


सरकार बदलने के साथ कुर्सी के दाम बढ़ते रहे और ये लोग बखूबी अदा कर रहे हैं। नतीजा यह है कि सरकारों के स्थानांतरण के तमाम मानक दरकिनार हो गए। कभी सरकार की सख्त रुख के बाद किसी को जिला छोड़ना भी पड़ा तो वह माहौल अनुकूल होते ही वापस हो गया। पश्चिमांचल व पूर्वांचल में तो तमाम अधिकारी इसी तरह के हैं।


मेरठ, कानपुर और अब चंदौली में परिवहन अधिकारियों पर कार्रवाई से विभाग की छवि धूमिल हुई है। भ्रष्ट अधिकारियों को लेकर सरकार सख्त है और यह देखा जा रहा है कि कौन अधिकारी मंडल-जिलों में कब से हैं। ऐसे अधिकारियों को बख्शा नहीं जाएगा। उनका स्थानांतरण अन्य स्थानों पर किया जाएगा।

के. रवींद्रनायक

परिवहन आय़ुक्त


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