Rajashree Production Declared New Project After Three Years of Prem Ratan Dhan Payo

दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

परिवहन विभाग अधिकारियों के लिए कमाई का परमिट बन गया है। परिवहन विभाग के प्रमुख सचिव एवं आइएएस कुंवर अरविंद सिंह के यहां पड़े आयकर छापे के बाद नौकरशाहों ही नहीं बल्कि परिवहन विभाग के कई बड़े अधिकारियों की नींद उड़ गई है। दरअसल इसके पहले भी मेरठ की संभागीय परिवहन अधिकारी, चंदौली के एआरटीओ, कानपुर में एआरटीओ सुनीता वर्मा, शताब्दी ट्रैवेल्स तथा वाणिज्य कर विभाग के सहायक आयुक्त के यहां छापेमारी में अकूत संपत्ति के दस्तावेज मिले थे। खास बात यह है कि इन सारे मामलों में परिवहन विभाग के तार जुड़े हैं।

 

दरअसल परिवहन विभाग के पूर्व प्रमुख सचिव रहे आइएएस की विभाग में तैनाती के दौरान भी कई घोटाले सामने आए थे। शासनस्तर तक जांच हुई, कार्रवाई की संस्तुति हुई लेकिन उसके बाद फाइलें ही गायब हो गईं। यही नहीं, रोडवेज की बसों में परिवहन नीर की आपूर्ति के ठेके को लेकर प्रमुख सचिव और तत्कालीन प्रबंधन के बीच रार भी देखने को मिली थीं। इसके अलावा बसों में ग्रीस, स्पेयर पार्टस, सीट व एलईडी लाइट लगाने के ठेके में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार सामने आया था लेकिन सारे मामले प्रमुख सचिव तक पहुंचते ही दफन हो गए। सूत्रों के मुताबिक घटिया ग्रीस व एलईडी लाइट्स के मामले में दोषी पाए गए प्राविधिक शाखा के कई के अधिकारियों के निलंबन तथा उनके खिलाफ कार्रवाई के आदेश हुए लेकिन यह पूरी फाइल शासन से निगम मुख्यालय में पहुंचते –पहुंचते लापता हो गई।

सूत्रों के मुताबिक इस पूरे प्रकरण को दाखिल दफ्तर करने में सचिवालय के ही कई अधिकारी शामिल थे और पूरे प्रकरण को दबा दिया गया। इसके पीछे बड़े पैमाने पर लेनदेन किए जाने की आशंका जताई जाती रही है। यही नहीं, आलमबाग बस अड्डे के निर्माण और उसके निर्माण एजेंसी को अनुबंध में निर्धारित समय से अधिक समय दिए जाने का मामला भी गत वर्ष मई 2017 में सामने आया। इसके लिए ज्यादा बारिश व मेट्रो को कारण बताते हुए तीन महीने मियाद बढ़ाने की बात कही गई। हालांकि अब तक यह मियाद छह महीना ज्यादा हो चुकी है लेकिन अनुबंध करने वाले अधिकारी ही इसकी जानकारी न होने से इंकार कर रहे हैं। इसी तरह से परिवहन निगम और परिवहन विभाग में तबादलों को लेकर भी हमेशा ही चर्चा में रहा है।
 

हर काम के तय है दाम

विभागीय तबादला हो या फिर किसी स्पेयर या खानपान सामग्री की आपूर्ति हर काम में दाम तय है। इसका नेटवर्क भी पूरी तरह से सुनियोजित है और अधिकारी ही मंत्री - सरकार तक पहुंचने का जरिया बने हैं। इसी पहुंच और रैकेट के कारण बड़े से बड़े गंभीर प्रकरणो में कार्रवाई नहीं हो पाती है और मामला ही गायब हो जाता है। सूत्रों के मुताबिक सचिवालय में ही करीब एक दर्जन अधिकारियों के खिलाफ गंभीर अनियमितता की शिकायतें लंबित हैं लेकिन उनकी जांच पूरी नहीं हो रही। उधर, अधिकारी प्रोन्नित पाते हुए अब सेवानिवृत्ति के मुहाने तक पहुंच गए हैं।

यहां तो एजेंट भी बेशकीमती संपत्ति के मालिक

वैसे परिवहन विभाग कमाई के मामले में बाकी विभागों की तुलना में कहीं आगे दिखाई देता है। अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राजधानी में ही लाइसेंस जारी करने वाली शाखा में लगा एक एजेंट ही आशियाना, शहीद पथ व कृष्णा नगर में कई संपत्तियों का मालिक है। इसी तरह से व्यावसायिक वाहनों के काम में लगे एक बाबू भी अपनी संपत्ति व कमाई को लेकर हमेशा चर्चा में रहता है। यही नहीं, विभाग के कई अधिकारी भी अपनी कमाई और एजेंसियों से तालमेल के लिए मशहूर है। खास बात यह है कि यह पूरा सिस्टम सचिवालय से दफ्तर तक चल रहा है और जमकर कमाई की जा रही है।

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