Box Office Collection of Dhadak and Student of The Year

दि राइजिंग न्‍यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

  • प्रदेश सड़क हादसे –  करीब 27 हजार

  • हादसों में मौत - 19350

 

राजधानी में कानपुर रोड को फैजाबाद रोड से जोड़ने वाला करीब 23 किमी लंबा शहीद पथ। मगर इस साल पहली जनवरी से तीस दिसंबर तक इस पर 56 सड़क हादसे हुए। 46 लोगों की जान गईं। ऐसा तब था कि जबकि कानपुर रोड तिराहे और गोमती नगर तिराहे हर वक्त ट्रैफिक पुलिस रहती है। शहीद पथ पर परिवहन विभाग का कथित इंटरसेप्टर भी अपनी सुविधा अनुसार गश्त करता है। मगर हादसे के बाद किसी को भी इस इंटरसेप्टर ने अस्पताल नहीं पहुंचाया।

 

शहीद पथ पर दोनों तरफ खड़े ट्रक व डंम्फर। मगर इनके पीछे लगने वाली रेडियम पट्टी (रिफ्लेक्टर स्ट्रिप) भी रंग खोकर फेड हो चुकी। कोहरे में करीब आधा दर्जन घटनाएं पहले से सड़क किनारे खड़े वाहन में पीछे तेज रफ्तार वाहन के आकर घुसने से हुए।

दरअसल यह उदाहरण प्रदेश में परिवहन विभाग की उदासीनता के नमूने भर हैं। देश में उत्तर प्रदेश सड़क हादसों में होने वाली मौत के आंकड़ों में अव्वल है। आलम यह है कि यहां हो रही मौत को लेकर उच्चतम न्यायालय तक गंभीर है। कई बार सरकार को फटकार लग चुकी है लेकिन नौकरशाह व अधिकारी केवल अपनी जेब भरने में लगे हैं। जबकि सड़क हादसों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। पिछले पांच दिनों पर ही नजर डाले तो दो दर्जन सड़क हादसे हुए और इनमें आधा दर्जन ऐसे थे जिनमें कई वाहन एक दूसरे से टकराएं। इन हादसों में 17 लोगों की मौत हुईं लेकिन मजाल है कि परिवहन विभाग के अधिकारी घटनास्थल तक गए हों।

बस दफ्तर में बैठक कर सड़क सुरक्षा की नसीहत देते जरूर नजर आते हैं। अधिकारियों की मनमानी का आलम यह है कि उच्चतम न्यायालय की फटकार पड़ी तो प्रत्येक बुधवार को हेल्मेट –सीट बेल्ट का अभियान शुरू कर दिया गया लेकिन उसका मकसद हादसे रोकने से ज्यादा कोर्ट को गुमराह करने के लिए कार्रवाई की रिपोर्ट तैयार करना भर दिखता है। सूत्रों के मुताबिक राजधानी में चालान की संख्या तक निर्धारित है और वह भी आम आदमियों के लिए। अन्यथा पुलिस या अन्य प्रभावशालियों के लिए इस जांच का कोई मायने नहीं है।

वाहनों में रिफ्लेक्टर तक में कमीशनखोरी

परिवहन विभाग द्वारा व्यावसायिक वाहनों में लगाए जाने वाले रिफ्लेक्टर टेप को लगाने में भी जमकर कमीशनखोरी हो रही है। परिवहन विभाग के फिटनेस ग्राउंड के बाहर झोला लगाकर रिफ्लेक्टर टेप की बिक्री हो रही है और चौड़े टेप को काटकर उसे वाहन के मुताबिक तैयार कर लिया जाता है। सारा खेल संभागीय निरीक्षक (प्राविधिक) के संरक्षण में। खास बात यह है कि यहां लगने वाले टेप को लेकर कई बार सवाल उठे। पूर्व परिवहन आयुक्त के.रवींद्रनायक ने इसके लिए कंटेंजेंसीफंड से पैसा लेकर इसकी जांच कराने के आदेश भी दिए लेकिन तबादले के बाद मामला ठंडे बस्ते में पहुंच गया। धंधा लगातार जारी है। नतीजा यह है कि वाहनों में लगने वाले रिफ्लेक्टर टेप चंद दिनों में ही फेड हो  रहे हैं। केवल फिटनेस के वक्त उनका मनमाना शुल्क वसूला जा रहा है और उसमें कुछ हिस्सा आरआई (संभागीय निरीक्षक) को भी मिल रहा है।

ट्रक ही नहीं, बसों से भी रिफ्लेक्टर स्ट्रिप गायब

व्यावसायिक वाहनों ट्रक –डंफर ही नहीं, राजधानी में रोडवेज बसों से ही रिफ्लेक्टर टेप गायब है। दरअसल रिफ्लेक्टर टेप लगाने का मकसद यह होता है कि कम प्रकाश में पीछे आ रहे वाहन की लाइट पड़ने पर यह टेप चमकने लगता है। इससे पीछे आ रहे वाहन चालक को आगे वाहन होने का आभास हो जाता है। मगर जब टेप ही घटिया लग रहा है या नहीं है तो हादसा हो रहा है। सड़क सुरक्षा इकाई द्वारा हादसों के विष्लेषण में भी सामने आया है कि दस फीसद हादसों का कारण पीछे वाहन के टकराने के कारण होते हैं। बावजूद इसके रोडवेज की बसों में ही रिफ्लेक्टर टेप या तो है ही नहीं और अगर हैं तो कम कम से दिखाई नहीं देते।

"फिटनेस ग्राउंड पर टेप लगाने में अनियमितता की जानकारी नहीं है। इसकी आकस्मिक जांच कराई जाएगी। अगर इसमें किसी तरह की अनियमितता हो रही है तो टेप लगाने वाले कारोबारी से लेकर संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।"

एके सिंह

आरटीओ

 

"सुरक्षा के मद्देनजर रोडवेज बसों में रिफ्लेक्टर टेप होना अनिवार्य है। इस संबंध में आदेश जारी कर दिए गए हैं। इसे सुनिश्चित कराना एआरएम और फोरमैन का काम है। अगर इसके बावजूद बसें बिना रिफ्लेक्टर टेप के चल रही हैं तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई होनी चाहिए"

सत्यनारायण

सेवा प्रबंधक (रोडवेज)

  

 

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