Neha Kakkar Reveald Her Emotional Connection with Indian Idol

दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

पुरानी खटारा मारुति वैन। पीछे के दोनों सीटों के बीच में लगी लोहे की बेंच और उस पर बैठे बच्चे। यानी 10 बच्चों के स्थान पर 16-18 बच्चे पीछे। आगे की सीट पर ड्राइवर के बगल में दो – तीन बच्चे। यह नजारा हर कालोनी –मोहल्ले में आम है। रोज सुबह तमाम लोग ऐसे ही अपने बच्चे को स्कूल भेजते हैं। दुखद यह है कि कोई अभिभावक इसका विरोध नहीं करता। अभिभावकों की इस समझौते के कारण स्कूल वाहन चलाने वाले तमाम आपरेटर अब माफिया की तरह से संचालन कर रहे हैं। हर स्कूल के बाहर सिंडीकेट बन गया है और उसी सिंडीकेट से वाहन तय होता है। खास बात यह है कि तमाम स्कूल अपने यहां निजी वाहनों के सम्बद्ध होने से इंकार करते हैं लेकिन दर्जनों ऐसे निजी कांट्रैक्ट पर लगे वाहन उनके कैंपस में खड़े होते हैं। आखिर क्यों।

 

कहा जाता है कि छोटे ताबूत का वजन बहुत ज्यादा होता है। दरअसल कुशीनगर में हुए हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर बच्चों के अवैध वाहनों से स्कूल जाने के लिए जिम्मेदार कौन है। परिवहन विभाग अपना दायित्व टालता है, महज कांट्रैक्ट कैरिज पर स्कूल परमिट देने की बात करता है लेकिन कोई अधिकारी यह नहीं बताता कि किस कांट्रैक्ट पर परमिट जारी हुआ था। कांट्रैक्ट अभिभावक से साथ हुआ या फिर स्कूल के साथ उसका कोई तो साक्ष्य़ होना चाहिए मगर ऐसा है नहीं। अभिभावकों के कांट्रैक्ट स्कूल परमिट मिल सकता है तो फिर प्राइवेट पूल वाहनों को स्कूली वाहन न मानना और उन पर कार्रवाई की बात सवालों में आ जाती है। विभागीय और सरकारी कार्यप्रणाली से इतर देखा जाएं तो इस पूरे गोरखधंधे को पहले स्तर पर ही रोका जा सकता है।

परिवहन विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी के मुताबिक अगर अभिभावक किसी वाहन से बच्चे को स्कूल भेज रहे हैं तो वह कम से कम इसकी तस्दीक तो कर ही सकते है कि वाहन फिट है। उसमें बैठने का व्यवस्था क्या है और वाहन नियमों के अनुरूप है। मगर ऐसा होता नहीं है। लिहाजा वाहन संचालकों की मनमानी बढ़ती जा रही है। पूरा खेल इस तरह से संगठित हो गया है कि वाहन पर कार्रवाई होते ही तमाम लोगों एकत्र हो जाते हैं औऱ मारपीट से परहेज नहीं करते।

 

स्कूल वाहन संचालक या स्कूल वाहन माफिया

कांवेंट स्कूल की मनमानी और निजी वाहनों से इंकार तथा अभिभावकों की उदासीनता का नतीजा है कि कांवेंट स्कूल के बाहर अब संचालकों की राज रहता है। इंदिरानगर, गोमतीनगर, निशातगंज, ठाकुरगंज व चौक क्षेत्र में कई संचालक कई कई दर्जन स्कूल वाहनों का संचालित कर रहे हैं। इनके चालक भी बहुत कम उम्र के है और नियमों का भी पालन नहीं करते हैं। खास बात यह है कि जांच में वाहन पकड़े जाने के बाद वाहन स्वामी तो पहुंच जाते हैं लेकिन चालक नदारद हो जाता है। जीप से लेकर ई रिक्शा तक स्कूल वाहन बन गए है और परिवहन विभाग सुप्रीम कोर्ट द्वारा केवल स्कूल बस के लिए मानक तय करने की दलीलें देता रहता है। सवाल यह है कि बच्चों की सुरक्षा निश्चित होगी तो कैसे।

"कुशीनगर में हुई घटना बहुत दुखद है और इसमें किसी भी दोषी बख्शा नहीं जाएगा। स्कूलों वाहनों की जांच के लिए विशेष अभियान चलेगा और अवैध वाहनों पर कार्रवाई की जाएगी।"

बीके सिंह

अपर परिवहन आयुक्त

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