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दि राइजिंग न्यूज़

संजय़ शुक्ल

लखनऊ।

 

उपचुनावों में करारी हार और फिर राष्ट्रव्यापी दलित आंदोलन के चलते भारतीय जनता पार्टी अब किसी भी कीमत पर दलित वोटों में सेंध लगाने में लग गई है। इसके लिए पहले पदोन्नति में आरक्षण का पैंतरा अपनाया गया और अब अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में दलितों – पिछड़ों के दाखिल में आरक्षण का पैरवी शुरू हो गई। इसके लिए अल्पसंख्यक आयोग ने मुस्लिम यूनीवर्सिटी को पत्र तक जारी कर दिया है। आजादी के बाद अचानक ही अल्पसंख्य विश्वविद्यालय में दलितों -पिछड़ों के आरक्षण की मांग तेज होने लगी है।

 

दरअसल वोटों के ध्रुवीकरण के लिए हिंदुत्व कार्ड को धार देने में लगी भाजपा की कवायद से हिंदू -मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण हो रहा है। ऐसे में दलित वोट अगर विपक्ष के खाते में गया तो भाजपा के लिए 2014 के मुकाबले आधी सीटें जीतना आसान नहीं होगा। लिहाजा सरकार विपक्ष को मात देने के लिए पूरी तरह से दलितों को ही साधने में लग गई है।

दरअसल सरकार यह पैंतरा सीधे तौर लोकसभा चुनावों से जुड़ा दिख रहा है। प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन ने भारतीय जनता पार्टी की पेशानी पर बल डाल दिए हैं। संगठन से केंद्र सरकार तक उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन को बरकरार रखने के लिए सारी कवायद कर रही है। इसका कारण भी है। समाजवादी पार्टी का परंपरागत वोट आधार यादव –मुस्लिम गठजोड़ है। इसी तरह से खुद को दलितों की पार्टी करार देने वाली बहुजन समाज पार्टी के पास दलितों वोटों का बड़ा हिस्सा है। इन दोनों के वोटों के कांबीनेशन के आगे कोई पार्टी नहीं दिखाई देती है। ऐसे में जीत के लिए इस वोट बैंक में सेंध जरूरी है और यही कारण है कि भाजपा दलित कार्ड खेल रही है।

 

दलित कार्ड को लेकर भाजपा कितनी गंभीर है कि पिछले दिनों एक तेजतर्रार छवि के पूर्व डीजीपी को अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया जबकि लंबे समय से दलित आंदोलन से जुड़े रहे दलित चितंक भी राज्य मंत्री का दर्जा पा गए। बात यही खत्म नहीं हुई है। सूत्रों के मुताबिक 2019 के चुनावी गणित के समीकरण सेट कर रही भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश सरकार में जल्द ही कुछ फेरबदल देखने को मिल सकते हैं। फेरबदल के तहत पश्चिम और पूर्व के कई दलित नेता सरकार में मंत्री बनाए जा सकते हैं। सूत्रों का कहना है कि इसके लिए मंथन पूरा हो चुका है और जल्द इसकी घोषणा कर दी जाएगी।

दूसरी तरफ विपक्षी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी इसे भाजपा की साजिश भर मानती है। उनके मुताबिक भाजपा कभी दलितों की समर्थक नहीं रही है। केवल सत्ता हासिल करने के लिए सरकार इस तरह के मामलों को हवा दे रही है। केंद्र सरकार चार साल पहले बनी थी लेकिन अभी तक अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में आरक्षण दिखाई दिया था न ही वहां लगी जिन्ना की तस्वीर। यह अब अंतिम समय में क्यों दिखाई दे रहे हैं। इसी तरह से दलित नेता अवधेश कुमार वर्मा के मुताबिक पदोन्नति में आरक्षण की हिमायत करने वाली भाजपा आजतक इस पर अमल नहीं करा सकी है। ऐसे में उसकी नीयत सवाल उठना लाजिमी है।

 

मुस्लिम –दलितों में रार

अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में पिछड़ों –दलितों को दाखिले में आरक्षण के पीछे दलित –मुस्लिम के बीच भेद पैदा करना है। दरअसल भाजपा यह जानती है कि दलित –मुस्लिम वोटों के एक साथ जाने से उसकी राह बहुत मुश्किल हो जाएगी और यही कारण है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में दाखिले में आरक्षण के नाम पर यह कार्ड खेला जा रहा है।

     

 

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