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दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

बात कुठआ में मासूम बच्ची के साथ हैवानियत की हो या फिर उन्नाव में विधायक पर गैंगरेप का आरोप। मगर जो माननीय सदन में बैठ कर कानून बना रहे हैं, वह खुद तमाम दाग समेटे हैं। अब कातिल ही मुंसिफ के भूमिका में होंगे तो हालात कैसे होंगे, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। एडीआर की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक देश में करीब 51 सांसद-विधायक माननीय दागी हैं। इन दागियों को माननीय बनाने में सबसे आगे राष्ट्रवाद की दुहाई देने वाली भारतीय जनता पार्टी है।

एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे ज्यादा दागी सांसद-विधायक भारतीय जनता पार्टी के हैं जिनकी संख्या 16 है। इसके बाद दूसरे पायदान पर शिवसेना है जिसके सात तथा तृणमूल कांग्रेस के छह सांसद विधायक माननीय हैं। एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म के मुताबिक यह रिपोर्ट माननीय द्वारा दिए गए शपथपत्रों के आधार पर ही तैयार की गई है, जिसमें उन्होंने खुद ही घोषित किया है।

रिपोर्ट के मुताबिक 1580 अर्थात् करीब 33 माननीय सांसद-विधायकों ने खुद पर इस तरह के वाद होने की बात स्वीकार की है। खास बात है कि इसमें 12 विधायक महाराष्ट्र से हैं तो पश्चिम बंगाल से 11 और आंध्र प्रदेश व ओडिसा से पांच-पांच सांसद जनप्रतिनिधि हैं।

महिला उत्पीड़न से अपहरण तक के मामले

रिपोर्ट के मुताबिक दागी माननीयों पर शीलभंग से लेकर महिलाओं का उत्पीड़न करने और अपहरण तक के मामले दर्ज हैं। बावजूद उसके इन पर कोई लगाम नहीं लगती है। इनकी दंबगई के बूते ही सियासी पार्टियां भी उन्हें हाथों-हाथ लेती हैं और उन्हें सदन में पहुंचाने का काम करती हैं। यही कारण है कि इस प्रवृत्ति पर कोई प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा है। इस तरह के दागी माननीयों के आगे कानून-पुलिस दोनों ही बेबस दिखाई देते हैं।

 

 

दागियों के चुनाव लड़ने पर रोक का मामला ठंडे बस्ते में

आपराधिक छवि वाले दागियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का मामला पिछले दिनों उठा था। इस पर चुनाव आयोग ने भी सहमति जताई, लेकिन यह किसी दल को नहीं भायी। नतीजा यह रहा कि पूरा का पूरा मामला ठंडे बस्ते में पहुंच गया। पिछले दिनों कठुआ और उन्नाव मामले में भी सरकार की कथनी करनी अंतर साफ दिखा। भले ही जनाक्रोश और कोर्ट की फटकार के बाद सीबीआइ ने उन्नाव के माखी से विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को गिरफ्तार कर लिया लेकिन प्रदेश के पुलिस प्रमुख और प्रमुख सचिव गृह महज आरोप का हवाला देकर उन्हें माननीय ही बताते रहें।

यही नहीं, एक पुलिस प्रमुख तो हवा के रुख के साथ पाला बदलते हुए बसपा शासनकाल में मुख्यमंत्री का एक पत्र लेकर भी सामने आ गए जिमसें एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग रोकने के निर्देश दिए गए थे। उन्हें प्रतिफल भी मिला और एक हफ्ते में वह आयोग के अध्यक्ष बना दिए गए। इसी तरह से महिलाओं की सुरक्षा को लेकर हमेशा तमाम दलीलें देने वाली भारतीय जनता पार्टी के विधायकों ने तो कठुआ मामले में अपने पदों से इस्तीफा तक दे दिया।

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