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एक नई पहेली है असली सपा ?

     
  
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  • नए दौर के नेता साइकिल की जगह मोटरसाइकिल की सवारी
  • कानूनी लड़ाई का केन्द्र भी मुलायम सिंह यादव ही होंगे

What next in samajwadi party fued will mulayam and akhilesh reunite

दि राइजिंग न्‍यूज

02 जनवरी, लखनऊ।

उम्मीदवारों की समानांतर सूची और फिर पार्टी का समानांतर सम्मेलन बुलाकर राम गोपाल और अखिलेश यादव ने साफ शब्दों में कह दिया कि वह मुलायम सिंह यादव को पार्टी अध्यक्ष या नेता ही नहीं मानते पर राजनीति की निष्ठुरता में इसका कोई ठिकाना नहीं कि जो लोग अभी अखिलेश को बगावत के लिए उकसा रहे हैं वे कब उनका साथ छोड़ देंगे। ऐसे में नया साल 2017 समाजवादी पार्टी के लिए न सिर्फ नया नेतृत्व लेकर आया है बल्कि उसके चयन के तौर तरीकों पर नई कानूनी लड़ाई भी लेकर आया है। इसके साथ ही मतदाताओं और देश के आम नागरिकों के लिए यह एक पहेली लेकर आया है कि 24 साल पुरानी समाजवादी पार्टी के किस धड़े को असली समझा जायकिसे असली मुखिया समझा जायजानकार कहते हैं कि सपा के असली-नकली की लड़ाई का फैसला होने में तीन-चार महीने का वक्त लग सकता है। तब तक सत्ता संघर्ष का मुख्य हवन यानी विधान सभा चुनाव हो चुका होगा।


समाजवादी पार्टी की लड़ाई में अब ये विकल्प

कहना न होगा कि, आगे की कानूनी लड़ाई का केन्द्र भी मुलायम सिंह यादव ही होंगे। अगर उन्होंने बागी गुट के फैसलों को चुनाव आयोग में चुनौती दी तभी उस पर कोई फैसला आ सकेगा क्योंकि पार्टी के संविधान के मुताबिक राष्ट्रीय अध्यक्ष को ही इस तरह के राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाने का अधिकार होता है। राष्ट्रीय अध्यक्ष के इनकार करने पर राष्ट्रीय कार्यकारिणी राष्ट्रीय अध्यक्ष को नोटिस देकर ऐसे अधिवेशन बुला सकता है लेकिन पार्टी महासचिव रामगोपाल यादव ने इन दोनों स्थितियों की अवहेलना कर अधिवेशन बुलाया थाइसलिए कानूनी पचड़े में इसे अवैध साबित करना मुलायम गुट के लिए आसान हो सकता है।


रविवार के राष्ट्रीय अधिवेशन से पहले मुलायम सिंह ने पत्र लिखकर कार्यकर्ताओं से अपील की कि वो अधिवेशन में शामिल न हों। उसके बाद दोबारा पत्र लिखकर मुलायम सिंह ने अधिवेशन को अवैध करार दिया और उसमें लिए गए फैसले को गैर कानूनी ठहराया। मुलायम ने पलटवार करते हुए रामगोपाल यादव को तीसरी बार पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। लगे हाथ जनवरी को पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन उसी जगह यानी लखनऊ के जनेश्वर मिश्र पार्क में बुलाया है। गौरतलब है कि आज (01 जनवरी) के अधिवेशन में अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है जबकि शिवपाल यादव को प्रदेश अध्यक्ष से हटा दिया गया है और अमर सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया है। मुलायम सिंह को पार्टी का मार्गदर्शक बनाया गया है।


विवाद का बहाना टिकटों का वितरण

लेकिन दोनों ओर की सूचियों में मुश्किल बीस पचीस सीटों पर है, जिसे सुलझाना कोई मुश्किल काम नहीं था। टिकट वितरण में असंतोष हर पार्टी में आम बात है, पर अगर शीर्ष नेतृत्व एकजुट है तो उसे हवा नहीं मिलती। जैसे एक म्यान में दो तलवारें नहीं रहती, वैसे ही एक पार्टी में दो अध्यक्ष नहीं हो सकते। उम्मीदवारों की समानांतर सूची और फिर पार्टी का समानांतर सम्मेलन बुलाकर राम गोपाल और अखिलेश यादव ने साफ शब्दों में कह दिया कि वह मुलायम सिंह यादव को पार्टी अध्यक्ष या नेता ही नहीं मानते पर राजनीति की निष्ठुरता में इसका कोई ठिकाना नहीं कि जो लोग अभी अखिलेश को बगावत के लिए उकसा रहे हैं वे कब उनका साथ छोड़ देंगे।


यह कर सकता है चुनाव आयोग

अब सवाल यह उठता है कि अगर मुलायम सिंह ने आज (01 जनवरी) के अधिवेशन को कानूनन चुनौती दी तो आगे क्या होगा? जानकारों के मुताबिक चुनाव आयोग सबसे पहले पार्टी का चुनाव चिह्न रिजर्व (फ्रीज) रख सकता है। ऐसी स्थिति में दोनों गुटों को बिना साइकिल के ही उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव के लिए दौड़ लगानी होगी। दोनों गुटों को अस्थाई चुनाव चिह्न दिया जा सकता है। सूत्र बताते हैं कि अखिलेश गुट ने इसके लिए तैयारी पहले से कर रखी है। हो सकता है कि नए दौर के नेता साइकिल की जगह मोटरसाइकिल की सवारी कर लें या फिर भूतपूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की पार्टी समाजवादी पार्टी के चुनाव चिह्न का इस्तेमाल कर सकती है। उसके लिए कानूनी कोशिशें जारी हैं। इससे पहले शिवपाल कुछ विधायकों के समर्थन से अखिलेश की सरकार गिराने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में अखिलेश बड़ा दांव खेलते हुए विधान सभा भंग करने की सिफारिश राज्यपाल से कर सकते हैं। हालांकि, ऐसी स्थिति में हो सकता है कि भाजपा राष्ट्रपति शासन का विकल्प चुने लेकिन नोटबंदी से परेशान भाजपा इसका जोखिम नहीं उठाना चाहेगी।


सत्ता में बने रहने के लिए केंद्र की सहायता चाहिए

चुनाव तक सत्ता में बने रहने के लिए उन्हें गवर्नर यानि केंद्र सरकार की सहायता चाहिएजबकि चुनाव जीतने के लिए पोलिंग बूथ स्तर तक पार्टी मशीनरी और परम्परागत वोट बैंक का साथ। इसमें कोई दो राय नहीं कि जहां मुख्यमंत्री अखिलेश यादव युवामध्यम वर्ग और महिलाओं के बीच लोकप्रिय हैंवहीं शिवपाल यादव ने जमीनी स्तर के पार्टी कार्यकर्ताओं को पाला पोसा है। मुस्लिम मतदाता अखिलेश यादव के बजाय मुलायम पर ज्यादा भरोसा रखता है। हकीकत यही है कि ये तीनों एक दूसरे के पूरक थेजो अब प्रतिद्वंदी बन गये हैं।

मुलायम और शिवपाल अखिलेश के बिना विधान सभा चुनाव में बहुमत भले न जुटा पायें, पर अखिलेश का खेल खराब करने की हैसियत तो रखते ही हैं। संभवत: इसीलिए मुलायम शिवपाल को पार्टी के अंदर ही बनाये रखने के लिए लगे रहे। वह चाहते थे कि अखिलेश शिवपाल और उनके दूसरे बेटे प्रतीक को साथ लेकर चलें और सत्ता में हिस्सेदारी दें, पर अखिलेश अपने को मुलायम का अकेला उत्तराधिकारी मानते हैं और शिवपाल को प्रतिद्वंदी। यही झगड़े की फसाद की जड़ है।


पारिवारिक लड़ाई का दारोमदार 77 वर्षीय मुलायम पर

आगामी विधानसभा चुनाव में अगर अखिलेश यादव कांग्रेस और लोकदल से गठबंधन कर चुनाव जीत जाते हैं तब भी कानूनी और पारिवारिक लड़ाई का दारोमदार 77 वर्षीय मुलायम सिंह यादव पर ही होगा कि क्या वो उस लड़ाई को आगे बढ़ाते हैं या फिर उसे भुलाकरपुत्रमोह में उनके सामने सरेंडर करते हैं। इसके साथ ही मुलायम सिंह को पुत्रमोह में अपने पुश्तैनी इलाकों में भी अग्निपरीक्षा देनी होगी जब वो विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए उन्हीं इलाकों में बेटे के खिलाफ रैलियां करेंगे जहां के लोग (रामगोपाल यादवधर्मेन्द्र यादवअक्षय यादवडिम्पल यादव) अब उन्हें समाजवादी छत्रप बनाने पर तुले हैं।




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