Jacqueline Fernandez is Upset From Salman Khan

दि राइजिंग न्‍यूज

आउटपुट डेस्‍क।

 

जहां बॉलीवुड में स्‍टारकिड्स ने अपना सिक्‍का जमा रखा है वहीं तापसी पन्‍नू ने खुद को मेहनत के बूते स्‍थापित किया है। हालांकि बॉलीवुड की जानी मानी एक्‍ट्रेस तापसी पन्‍नू का कहना है कि उनका संघर्ष अभी खत्‍म नहीं हुआ है। वह अभी भी स्ट्रगल कर रहीं हैं। कभी वजह नेपोटिज्म बनता है तो कभी फेवेरेटिज्म। तापसी ने सूरमा में अच्‍छी खासी एक्टिंग की, उन्‍हें काफी तारीफ भी मिल रही है।

आइए सूरमा और उनकी अन्‍य आने वाली फिल्‍मों पर आपको तापसी से हुई बातचीत पढ़ाते हैं

 

सूरमा से किस तरह से जुड़ना हुआ 

मुझे बोला गया कि आपको हॉकी सीखनी पड़ेगी। मैंने सीखी। बाकी मुझे लिया ही इसलिए गया था क्योंकि मैं सरदारनी हूं। बॉडी वाइज मैं एथलीट लगती हूं। मैं जब स्क्रिप्ट सुनने आयी थी तो इनलोगों ने यही कहा कि सरदारनी हैं तो पंजाबी स्लैग होगा ही। खेलने के सवाल पर मैंने बताया कि कोई एक खेल नहीं, मैं सभी खेल चुकी हूं जैसे वॉलीबॉल, बैडमिंटन, रेस। अभी भी स्क्वैश खेलती हूं। उन्होंने कहा कि चलो फिर सेट पर चलते थे। संदीप सर के साथ मैंने हॉकी के सेशन लिए और मैं फिल्म का हिस्सा बन गयी।

पापा भी हॉकी खेल चुके हैं

मेरे पिता दिल्ली यूनिविसिर्टी के लिए हॉकी खेलते थे। मेरे पापा मेरे बहुत बड़े क्रिटिक्स हैं। मैं जो भी करूं वह हमेशा कहते हैं कि उसमे और अच्छा हो सकता था। वहीं मेरी मां मैं कोई बकवास चीज भी करूं तो वो कहती हैं कि मेरी लड़की ने बहुत अच्छा किया है। मेरी मम्मी को हर चीज अच्‍छी लगती है। पापा ने सूरमा के ट्रेलर देखकर कहा कि बाकी तो ठीक है लेकिन वो रोगटें खडे कर देने वाली फीलिंग है या नहीं, वो तो फिल्म देखने के बाद ही बताऊंगा। उन्होंने पूरी तारीफ कभी नहीं की। बारहवीं क्लास में जब मेरे नब्बे परसेंट आए थे तब भी उन्होंने तारीफ नहीं की थी। एक लड़की का नंबर मुझसे ज्यादा आया था। पापा का कहना था कि थोड़ा मेहनत करती तो उसे पीछे कर सकती थी। 

 

पापा के इस रवैये की वजह से आपका बचपन कितना सहज था 

सच कहूं तो मैंने इसे प्रेशर की तरह कभी लिया ही नहीं है। मुझे हमेशा से ही पता था कि पापा को बहुत उम्मीदें मुझसे हैं। फैमिली में सारे कंजिंस में सबसे ज्यादा नंबर मेरे ही आते थे तो उन्हें लगता है कि हर बारी इसी के नंबर ज्‍यादा आते रहें। मेरे बहन को बोला जाता था कि बस तू पास हो जा।

पापा ही नहीं स्कूल के टीचर्स भी मुझसे बहुत उम्मीद लगाते थें। मैं स्कूल हेडगर्ल थी तो स्कूल के टीचर भी मुझे बोलते थे कि तुम्हें इसी कंपीटिशन में जाना है तो तुम्हें अच्छे नंबर लाने ही पड़ेंगे। मेरी बहन बहुत रिलैक्स रहती थी। वहीं मैं बहुत ज्यादा प्रतिस्पर्धा में यकीन करने वाली रहती थी। हमेशा मुझे जीतने का जुनून होता था। कई बार तो वॉलीबॉल या बास्केटबॉल का मैच हारने के बाद मुझे बुखार आ जाता था। हार के दुख से उबरने में दो दिन तो जाते ही थे।

अब आप कितनी कंपीटिटेव हैं और हार को कितनी सहजता से लेती हैं

उम्र के साथ आप सीख जाते हैं। जिंदगी में कई दफा हार मिलती है। धीरे-धीरे आप समझते हैं कि हार को कैसे हैंडल किया जाए। मैं जिस फील्ड में हूं वहां हर दिन रिजेक्शन झेलने को मिलता है। कई सारी ऐसी बातें सुनने को मिलती है जो हम सुनना नहीं चाहते हैं। 

क्या अभी भी रिजेक्शन मिलते हैं 

मैंने जहां से शुरुआत की थी वहां से यहां तक पहुंचना ही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है क्योंकि मैंने अपनी जिंदगी में कभी एक्टर बनने के बारे में सोचा नहीं था, लेकिन ये भी नहीं है कि मेरे लिए चीजें आसान हो गयी हैं। अभी भी पिक्चरें मिलने की स्ट्रगल होती है। जिनके साथ मैं काम करना चाहती हूं वो मुझे पिक्चर देंगे या नहीं। मैं उनको बोलूं कि मुझे आपके साथ काम करना है तो वो मुझे फिल्में दे देंगे ऐसा नहीं है। नेपोटिज्म हो या फेवेरेटिज्म वो इंडस्ट्री में रहता ही है। मेरे लिए अच्छी बात ये होती है कि मैं जिन निर्देशकों के साथ काम करती हूं, उनके साथ मेरा रेपो इतना अच्छा बन जाता है कि वही लोग मुझे अपनी फिल्मों में रिपीट करते हैं। 

 

इस फिल्म में आपके साथ दिलजीत हैं उनके साथ कैसी रही पंजाबी बॉडिंग

 मैं उनके बिल्कुल अपोजिट है। मैं बहुत ज्यादा बोलती हूं। वो मुश्किल से बोलते हैं। मेरे लिए ये बहुत जरूरी है कि मैं सेट पर अपने कोएक्टर से बात करूं। दोस्ती करूं ताकि परदे पर बॉडिंग दिखी। मैंने बहुत ही बेशर्मी से जा जाकर दिलजीत से बातें की है। मुझे पता भी नहीं है कि वो सुन भी रहे हैं या नहीं लेकिन मेरी चपड चपड़ चालू रहती थी। वो मुझे गल्ला दी रानी बोला करते थे। जहां तक बात पंजाबी की है तो मैं पंजाबी लिख पढ लेती हूं लेकिन बोलने में दिलजीत और अंगद बेदी मुझसे ज्यादा अच्छी बोलते हैं। दरअसल घर पर हमारे जेनेरशन के जो लोग हैं। हम हिंदी में बात करते हैं इसलिए पंजाबी हमारी उतनी अच्छी नहीं है।  

इंडस्ट्री ने कितना आपको अपना लिया है क्या आपके दोस्त बनें हैं

मैं ज्यादा सोशल नहीं है। मेरा कोई फ्रेंडस ग्रुप नहीं है इंडस्ट्री में ज्यादा से ज्यादा एक दो फिल्मों की स्क्रीनिंग पर बुलाने पर चली जाती हूं। नहीं तो मैं ज्यादा गेट टुगेदर पार्टी में होती नहीं हूं। इंडस्ट्री में वैसे खास दोस्त या ग्रुप नहीं है और मैंने कभी बनाने की एक्स्ट्रा कोशिश भी नहीं की। मेरे लिए एक्टिंग जॉब है। मैं जॉब को घर में लेकर नहीं जाती हूं। सेट पर खत्म हो जाती है। मैं घर आकर नॉर्मल लाइफ जीना चाहती हूं। इसकी एक वजह ये भी है कि मैं पर्दे पर रेगुलर और गर्ल नेक्स्ट डोर किरदार करती हूं। अगर मुझे ही पता न हो की गर्लनेक्स्ट होती कैसी हैं तो एक्टिंग कैसे कर पाऊंगी। मैं वीआईपी  ट्रीटमेंट में यकीन नहीं करती हूं। मैं एयरपोर्ट पर लाइन में लगती हूं।

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