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 “वापस न लौटने की जिद थी तब जाकर इस मुकाम पर पहुंचा”

Personality | 03-Nov-2017 | Posted by - Admin
  • फिल्म दस्तूर के नायक अभिजय सिंह से बेबाक बातचीत
   
In Conversation With Abhijay Singh

दि राइजिंग न्‍यूज

लखनऊ।

खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से आगे, खुदा बंदे से यह पूछे बता तेरी रजा क्या है..।

कुछ यही फलसफा है मायानगर में उभरते अभिनेता अभिजय सिंह के सात सालों के संघर्ष का। उनकी फिल्म “दस्तूर” जिसमे वो मुख्य भूमिका निभाने जा रहे हैं उसकी शूटिंग शुरू जल्द ही शुरू होने वाली है। अपने करियर के लम्बे अन्तराल में उन्होंने तमाम उतार चढ़ाव देखें। कई बार हताश हुए, मगर संघर्ष का जज्बा ना तो टूटने दिया और ना ही बिखरने। उनकी जिद कुछ करके ही वापस लौटने की थी और आखिर में वो अपनी मंजिल पर पहुंच ही गये।

फिल्मों में काम करने की चाहत थी मगर वापस घर न जाने की जिद। यही मंजिल पर पहुंचने का जरिया बनी। आज यह सोच कर खुशी भी होती है कि मैं वापस नहीं लौटा। अपनी फिल्म दस्तूर (ए-ट्रुथ) के बारे में बातचीत के दौरान अभिनेता अभिजय सिंह ने कुछ इसी तरह की बातें कहीं। वह बताते हैं कि काम हासिल करने के प्रयास में कई बार मायूसी झेलनी पड़ी। कई बार दिल टूटा और हौसला डगमगाया। लगा कि यहां कुछ नहीं है लेकिन फिर जिद थी कि वापस नहीं जाना है और शायद उसी का नतीजा यह है कि आज मुकाम तक पहुंचा हूं।

फिल्म में काम करने के दौरान दिलचस्प अनुभव की बावत पूछने पर वह बताते हैं कि फिल्म में रोमांस का सीन करना था। सहयोगी सह कलाकार के साथ फिल्मांकन होना था लेकिन पहली बार इस तरह का सीन को करने में मैं कुछ सकुचा रहा था। संहयोगी अदाकारा की मदद से यह सीन हो पाया। अपने मुंबई में स्ट्रगल के अनुभव की बावत अभिजय सिंह बताते हैं कि पिछले दो तीन साल में कई फिल्म छोटे मोटे रोल मिले। दो फिल्म भी कीं लेकिन अभी वह आई नहीं है। इतना जरूर है कि मैं को रोल करना चाहता हूं, उसकी अभी प्रतीक्षा है।

अपने पंसदीदा रोल की बावत अभिजय बताते हैं कि उनका मन एक मानसिक विक्षिप्त खलनायक के रूप में भूमिका करने की है। लगता है कि मैं उसे बेहतर तरीके से कर सकता हूं। अभी मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं। शाहजहांपुर के सलान के किसान परिवार के अभिजय सिंह बताते हैं कि उनकी शिक्षा ज्यादा नहीं है लेकिन उनके चार भाई व तीन बहनों ने जैसे तैसे शिक्षा प्राप्त की है। पढ़ाई के दौरान ही मैं लखनऊ में एक थियेटर ग्रुप से जुड़ गया। उसके बाद करीब सात साल पहले वर्ष 2010 में मैं मुंबई चला आया। उसके बाद यहीं पर संघर्ष करता रहा।

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