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...पत्नी की शर्त पर हैरान हो गए यूपी के गर्वनर

     
  
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  • पं दीनदयाल के अलावा अटल और अडवाणी मेरे आदर्श नेता
  • प्रधानमंत्री मोदी का काम और जुनून भी अच्छा लगता है

exclusive interview of governor raam naik with the rising news


दि राइजिंग न्‍यूज

कमल दुबे

यूपी में अब तक के कुल 41 गर्वनरों में राम नाईक की गिनती सबसे अधिक लोकप्रिय राज्यपालों में होती है। संघ के इस जमीनी कार्यकर्ता में 82 साल की उम्र में भी काम करने का जज्बा और समाज सेवा का जुनून देखते ही बनता है। निजी रिश्‍तों और संवैधानिक जिम्मेदारियों की नयी इबारत लिखने वाले राम नाईक ने महज दो साल और तीन महीने की अपनी पारी में बड़ा मुकाम हासिल किया है। बेहद सादगी भरा जीवन पसंद करने वाले रामनाईक को वैसे तो शाकाहारी भोजन अच्छा लगता है लेकिन मछली भी खाने से नहीं चूकते हैं।


बचपन में अखबार बेंचकर अपनी पढ़ाई पूरी करने वाले राम नाईक को कम्पनी सेक्रेटरी की नौकरी से इस्तीफा देकर समाज सेवा की डगर पर कदम रखने से पहले पत्नी की कठिन शर्त का सामना करना पड़ा। रोजमर्रा के सरकारी कामकाज और संवैधानिक मामलों से अलग हटकर राज्यपाल रामनाईक ने अपनी जिन्दगी के कुछ अहम और समाज को प्रेरणा देने वाली बातों को दि राइजिंग न्यूज के साथ लम्बी बातचीत में साझा किया।


बचपन कैसा रहा

पिता दामोदर दास नाईक महाराष्ट्र की तीन हजार की आबादी वाली सांगली रियासत के राजा के स्कूल में मुख्य अध्यापक थे। दसवीं तक की पढ़ाई पिता के स्कूल में हुई और हमेशा स्कूल की क्लास में टापर रहा। हम तीन भाई और दो बहन थे। दसवीं कक्षा पास होने के बाद पिता ने कहा कि 4 साल के लिए पढ़ाई की व्यवस्था करूंगा और आगे की पढ़ाई के लिए फीस का इंतजाम करना होगा।


फिर आगे की पढ़ाई

सांगली से आकर आगे की पढ़ाई मैने पुणे में आकर की और वर्ष 1954 में बी.काम. किया। इस दौरान मै सुबह अखबार बेंचता और ट्यूशन भी करता ताकि फीस की व्यवस्था हो सके। मराठी के बड़े साहित्कार गजानन दिगम्बर माडगुलकर मेरे पिता के विद्यार्थी रहे थे। पिता के विद्यार्थी होने के नाते पुणे में 2 साल तक उनके बंगले में रहकर मैने पढ़ाई की।


विवाह कब और कैसे

1954 में बी.काम करने के बाद नौकरी के लिये मुम्बई आ गया जहां एकाउन्टेंट जनरल के दफ्तर में सीनियर क्लर्क की नौकरी की। दो साल बाद बस बनाने वाली एक बड़ी निजी स्टील कम्पनी में नौकरी मिलने पर वर्ष 1960 में अरेंज मैरिज की। मेरी दो बेटियां निशी गंधा तथा विशाखा हैं। बड़ी बेटी निशी गंधा कैंसर रिसर्च साइंटिस्ट है तो दूसरी बेटी पत्रकार थी। जब मैं सांसद बना तो पत्रकार बेटी ने नौकरी छोड़ दी और अब वह मेरा काम देखती है।


नौकरी से अचानक राजनीति

बचपन से ही मेरा संघ से जुड़ाव रहा, लेकिन वर्ष 1969 में जब मैं कम्पनी सेकेट्री था ‍तो मुझे लगा कि भारतीय जनसंघ के लिए पूरे समय काम करूं। अनुमति मिलने की उम्मीद से यह बात मैने पत्नी को बतायी लेकिन हुआ उल्टा। पत्नी ने तुरंत शर्त रख दी और नौकरी करने की इजाजत मांगी। यह निर्णय लेना मेरे लिये कठिन था क्योंकि उनदिनों महिलाओं को नौकरी कराना बहुत अच्छा नहीं माना जाता था। मुझे चिन्ता में देख पत्नी ने समझाया कि, आपके नौकरी छोड़ने और जनसंघ को पूरा समय देने से मेरे सामने परिवार चलाने का संकट खड़ा हो सकता है लिहाजा मेरा नौकरी करना जरूरी है। अन्तत: मैने पत्नी की शर्त मानी और 1969 में कम्पनी सेक्रेटरी के पद से इस्तीफा देकर जनसंघ के लिये समर्पित हो गया। उनके बाद पत्नी ने बीएड करके नगर पालिका स्कूल में नौकरी कर ली।


ऐसी घटना जिसने जीवन बदला

बात मुम्बई की है जब जनता पार्टी के गठन की बात चल रही थी और जनसंघ का इसमे विलय होना था। लोनावाला में बैठक करके हम लोग वापस लौट रहे थे। वहां का पार्षद जीप चला रहा था और जीप में चार या पांच लोग बैठे थे। मैं जीप के एक किनारे थे जबकि बीच में चन्द्रबली सिंह बैठे थे जो मुम्बई जनसंघ के अध्यक्ष थे। रास्ते में पनवे मिलता है जहां के तरबूज काफी चर्चित है।


जीप में हम लोग बातें कर रहे थे कि जनता पार्टी में विलय के बाद जनसंघ के कार्यकर्ता के रूप में आगे हम नहीं मिलेंगे। एक-दूसरे को विदाई के रूप देने के लिए रनवे पर तरबूज खरीदे। तरबूज खरीदने के बाद चन्द्रबली सिंह मुझसे कहा कि आप बहुत हवा खा चुके और अब गाड़ी के बीच में बैठो, किनारे मैं बैठूंगा। कुछ दूर चलने के बाद हमारी जीप सामने से आ रही ट्रक से टकरा गई। जिसमें चन्द्रबली सिंह की मौके पर मौत हो गई जबकि हम बच गये। यह हादसा मुझे आज भी विचलित कर देता है।


राजनेताओं में सबसे अधिक पसंद

देश की राजनीति के तीन नेताओं को आदर्श मानता है। जिममें पहले नम्बर पर पं दीनदयाल उपाध्याय का नाम है। जिनके साथ मैंने कभी काम तो नहीं किया लेकिन उनके विचारों से बहुत प्रभावित हुआ। उनके विचारों को पर बहुत काम किया है। मेरे दूसरे आदर्श नेता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई है जिनके साथ सांसद के रूप में तथा उनकी सरकार के मंत्री के काम किया। सबको साथ लेकर चलने की विशेषता वाजपेई जी से सीखी। तीसरे नम्बर पर मैं लालकृष्ण आडवाणी को मानता हूं। संगठन चलाने की आडवाणी जी में मैंने गजब की क्षमता देखी है। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का काम करने का अन्दाज भी अच्छा लगता है।


फिल्मों का शौक नहीं

न तो फिल्में पसंद है और न ही हीरो-हीरोइन। साल में एक या दो पिक्चरें तभी देखता हूं जब कोई बहुत ज्यादा आग्रह करता है।


खाने में क्या पसंद

वैसे तो मैं शाकाहारी भोजन ही पसंद करता हूं लेकिन मुम्बई में मेरा निर्वाचन क्षेत्र 75 किमी. समुद्र से घिरा है। अपने वोटरों के बीच मेरा जाना-आना काफी रहा है। उनके यहां जाने पर नानवेज के रूप में मछलियां आती है। जिसे खाने से मै परहेज नहीं करता। मेरी आदत है कि जो जहां मिले वही भोजन होता है।


गर्वनर बनने के बाद दिनचर्या

राजनीतिक जीवन में कब कहां जाना पड़े, काफी मुश्‍किल होता है। ऐसे में समय पर खाना-पीना नहीं हो पाता था लेकिन गर्वनर बनने के बाद दोपहर और रात का भोजन समय पर मिलता है।


युवा पीढ़ी को संदेश

खुद का भविष्य खुद ही बनाना पड़ता है। दूसरों की सुनें लेकिन अपने मन के अनुसार काम करें सफलता मिलनी तय है। इसके साथ ही जीवन में प्रमाणिकता और पारदर्शिता बेहद जरूरी है।



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