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रोशनी की एक किरण ही काफी है...   

Personality | 11-Jan-2018 | Posted by - Admin
   
A day with Doctor Sarvesh Tripathi

दि राइजिंग न्यूज़

लखनऊ।

तमाम नाकामियों और असफलताओं के बीच उम्‍मीद की एक छोटी सी किरण ही काफी है। जो आपको आपकी मंजिल तक पहुंचा सकती है। पेशे से चिकित्‍सक और एक सजग समाजसेवी डॉ. सर्वेश त्रिपाठी का ऐसा ही मानना है। इसी सकारात्‍मक नजरिए की ही बदौलत उन्‍होंने तरह-तरह की अड़चनों के बावजूद वह कर दिखाया जो शायद हर किसी के बस का काम नहीं। चिकित्‍सक बनकर वह अपने रुतबे को बढ़ा सकते थे, विदेश जाकर पैसा कमा सकते थे लेकिन नहीं, उन्‍होंने यह राह नहीं चुनी…बल्कि यहीं अपने शहर में ही रहे और उन वृद्धों का सहारा बने जिन्‍हें वाकई सहारे की जरूरत थी। महानगर में डॉ.सर्वेश त्रिपाठी ने हनुमंत वृद्धाश्रम की शुरुआत की। वह महानगर में ही एक पॉलीक्‍लीनिक भी चलाते हैं।


 

शुरुआत से सेवा भाव था

बकौल डॉ. सर्वेश, “मेरे अंदर सेवा भाव शुरुआत से था। मैं एक चिकित्‍सक हूं तो पहले अस्‍पताल खोलने का ख्‍याल आया था। कई सुझाव भी आए, लेकिन मैं अपने अंदर के सेवा भाव को दबा न पाया और फिर एक दिन बैठे-बैठे विचार आया कि ओल्‍ड एज होम खोलना चाहिए। बस, मैंने अपने मन की सुनी और आज नतीजा आपके सामने है। धन्‍य हूं मैं इन वृद्धजनों जो मुझे इनकी सेवा का अवसर मिला। अब मैं ज्यादातर समय इन्ही के बीच बिताता हूं। यकीन मानिए, बड़ा सुख मिलता है।“

राह आज भी कठिन है

दिक्‍कतें जितनी पहले थी उतनी आज भी हैं। कांटो भरी राह तो हमेशा ही रहेगी, लेकिन हम हिम्‍मत नहीं हारेंगे। शुरुआत में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इस प्रकार का कोई भी काम करने में बहुत सी मुश्किलें आती ही हैं। जो आपके मन में बात पल रही है जरूरी नहीं कि आपके परिवार या आपके करीबी भी वही महसूस कर पाएं। ऐसे में अपनी बात उन तक पहुंचाना बेहद कठिन हो जाता है। मेरे साथ ही ऐसा ही हुआ था। एक वक्‍त तो ऐसा लगा था कि अब बस, हिम्मत टूटने लगी थी, लेकिन कहते हैं न भगवान के घर देर है लेकिन अंधेर नहीं। अब काफी हद तक चीज़े सुलझ गयीं हैं। परेशानियां अभी भी हैं लेकिन रोशनी की एक किरण अंधेरे को मिटा देती हैं।

लोगों का प्‍यार और ईश्‍वर का आशीर्वाद है

पैसे की दिक्‍कत तो होती ही है। कोई निर्धारित जरिया नहीं है। कुछ दोस्‍त हैं जो हर माह एक निश्चित रकम भेजते हैं। दान भी आ जाते हैं। बाकी मुझे खुद ही करना होता है।

आखिर हम भी कुछ हैं

जब तक शरीर में ताकत रहती है तब तक व्‍यक्ति पर निराशा हावी नहीं हो पाती। उम्र बढ़ने के साथ ही उनमें यह भावना आने लगती है कि अब वे कुछ भी नहीं। हम प्रयास करते हैं कि सभी बुजुर्ग खुद की महत्‍ता को समझें। वे समझें कि “आखिर हम भी कुछ हैं”। जिस माहौल से आए हैं हमारी कोशिश रहती है कि हम भी उन्‍हें उसी माहौल में रखें। इसीलिए हम कई एक्टिविटीज़ कराते रहते हैं। जैसे चौपाल, भजन आदि। कई लोग स्‍वेच्‍छा से आकर इसमें हिस्‍सा लेते हैं। 

यहां वे जो चाहें खुल कर कर सकते हैं। किसी के लिए कोई प्रतिबंध नहीं है। हमारी ये कोशिश रहती है हम इन सभी के जवानी के दिन इनको लौटाएं। यहां इनकी सुविधा के अनुसार हर चीज़ उपलब्ध है। मैं रहूं या ना रहूं इनको किसी चीज़ के लिए इंतज़ार नहीं करना पड़ता। यहां एक गाड़ी के साथ ड्राईवर हर वक्त मौजूद रहता है। मैं खुद एक डॉ. हूं तो इमरजेंसी के वक्त मैं हैंडल कर लेता हूं। अगेर मुझसे नहीं हो पाता तो एक हॉस्पिटल से हमारा टाईअप है। वो संभालते हैं।

हनुमंत वृद्धाश्रम का कुछ ऐसा है माहौल

डॉ. त्रिपाठी से बातचीत करने के बाद दि राइजिंग न्यूज़ की टीम ने वृद्धाश्रम का माहौल देखा। काफी बेहतरीन लोगों से हमरा इंटरेक्शन हुआ। इस वृद्धाश्रम के सबसे पहले सदस्य बने शरद प्रसाद श्रीवास्तव बताते हैं की वे इलाहाबाद के रहने वाले हैं। सर्विस के सिलसले में उनका लखनऊ में आगमन हुआ। सचिवालय में नौकरी की और रिटायर होने के बाद यहीं रहना पसंद किया। पत्नी के देहांत के बाद कुछ दिन वो बिठूर में भी रहे। ये हमारा सौभाग्य ही है तो हमे इस आश्रम में रहने का मौका मिला। मुझे यहां हर प्रकार की सुविधा मिल रही है। सरकार पेंशन देती है तो उसका कुछ हिस्सा मैं यहां देता हूं क्योंकि एक दूसरे के सहयोग से ही दुनिया चलती है।

आलोक कुमार श्रीवास्तव (64 वर्षीय) न बोल सकते हैं और ना ही सुन सकते हैं। लेकिन डॉ. त्रिपाठी के मुताबिक, ये सबसे इंट्रेस्टिंग कैरक्टर हैं। सबसे पहले पूरे आश्रम में यही उठते हैं। नहा-धो कर सबसे पहले तैयार हो जाते हैं। और उसके बाद अख़बार उठा कर अपने मतलब की चीज़ ढूंढते हैं। इन्‍होंने एक डायरी बना रखी है जिसमे ये बॉलीवुड के सभी एक्टर-एक्ट्रेस की डिटेल्स लिखते हैं। चूंकि ये इलाहाबाद के हैं इसलिए अमिताभ बच्चन के फैन हैं।

इनके बिना मैं शायद कुछ न कर पाता

मिस सुषमा सक्सेना से डॉ. त्रिपाठी को बहुत मदद मिली। ये आश्रम को अपना पूरा समय देती हैं। कुछ पर्सनल समस्‍याओं की वजह से इन्होने कभी शादी नहीं की। डॉ. साहब इनको अपना राईट हैण्ड मानते हैं।

 

 

 

 

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