Ali Asgar Faced Molestation in The Getup of Dadi

दि राइजिंग न्यूज़

आउटपुट डेस्क

 

दुर्घटना के चलते हाथ गंवा देने वाले लोगों के लिए एक राहत भरी खबर है। अभी तक चिकित्सा जगत में ऐसे लोगों को प्रोस्थेटिक हाथ लगाने की सुविधा प्रत्यारोपण के बाद ही मिल पाती है लेकिन जल्द ही उन्हें प्रत्यारोपण की जरूरत नहीं रहेगी। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक ईजाद की है जिसमें नसों पर सेंसर लगते ही बगैर ऑपरेशन प्रोस्थेटिक हाथ लगा दिया जाएगा। इसकी कलाई और अंगुलियां नसों पर लगे सेंसर के अनुसार कार्य करेंगी। 

 

बंगलुरू में चल रहे देश के सबसे बड़े फॉर्मा सम्मेलन में इस तकनीक को पेश किया गया। रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने इसे मेड इन इंडिया का सबसे बड़ा उदाहरण बताया। अभी तक आठ लोगों पर इस तकनीक का सफल परीक्षण हो चुका है। जल्द ही इसे आइएसआइ की मंजूरी के लिए भी भेजा जाएगा। बता दें कि अभी तक एम्स और कोच्चि स्थित अमृता अस्पताल जैसे चुनिंदा संस्थानों में ही हाथ प्रत्यारोपण होता है। डॉक्टर्स को एक प्रत्यारोपण में 14 से 16 घंटे लगते हैं और इसमें करीब 20 लाख रुपये तक का खर्चा आता है। भारत में पहली बार किसी विदेशी नागरिक का हाथ प्रत्यारोपण 8 अगस्त 2017 को कोच्चि में हुआ था।

यहां से शुरू हुआ शोध

कुछ समय पहले इंजीनियर लेबरीन डीसा ने इस मॉडल पर काम किया था। इसके बाद उनकी टीम में पांच और इंजीनियर ने मिलकर इस प्रोस्थेटिक हाथ को बनाना शुरू किया। पटना के आईआईटी इनक्यूबेशन सेंटर की प्रयोगशाला में शोध किया गया। सरकार ने इस शोध के लिए करीब 10 लाख रुपये और प्रयोगशाला की सुविधा दी। मंजूरी मिलने के बाद समझा जाता है कि इसकी कीमत एक लाख रुपये होगी। वैज्ञानिकों ने इस शोध को रोबोबॉयोनिक्स नाम दिया है।

एम्स के डॉक्टर्स ने भी जांचा

एम्स और आइआइटी दिल्ली के विशेषज्ञों ने उनके मॉडल की जांच की है। फेलोशिप निदेशक डॉ. प्रभात झा की देखरेख में शोध पूरा किया गया है। रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि सभी मानक पूरे करने के बाद इस तकनीक को सरकारी मेडिकल कॉलेजों में उपलब्ध कराया जाएगा ताकि सरकारी खर्चे पर ज्यादा से ज्यादा लोगों को विकलांगता के दलदल से बाहर निकाला जा सके।

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