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दि राइजिंग न्यूज़

आउटपुट डेस्क।

भारतीय संस्कृति में किसी भी कार्य को करने से पहले उस कार्य को कब और कैसे करना चाहिए, यह विचार किया जाता है, जिसे लोग मुहूर्त कहते हैं। मुहूर्त में काल के अवयवों के रूप में तिथि, वार, नक्षत्र, योग एवं करण आदि को महत्व दिया जाता है। इनमें से वार सर्वाधिक सुगम एवं सरल अवयव है, इसलिए इसे हर व्यक्ति अपने उपयोग में अपनी तरह लेता है और उसी अनुसार कार्य करने लगता है। सामान्यतया सात वारों में रवि, मंगल को क्रूर एवं शनि को अशुभ माना जाता है।

स्थापना एवं निर्माणादि वास्तु के कार्यों में शनि को शुभ माना जाता है। भारतीय परम्परा में किसी वृक्ष एवं पौधे को अपने उपयोग के लिए लगाना, काटना या उसके पत्ते लेना आदि इन सभी कार्यो को मुहूर्त में ही करने की लोक परम्परा थी और कहीं-कहीं अभी भी है।

वैद्य भी मुहूर्त के अनुसार ही औषधीय वनस्पति को निकालते थे। मुहूर्त की जटिलता एवं मुहूर्त के सबके लिए सुगम व सुलभ न होने के कारण आज भी वार का ही उपयोग सामान्य लोग करते हैं। मुहूर्त के प्रधान अवयव तिथि-वार आदि सभी विष्णुरूप माने गए हैं।

“तिथिर्विष्णुस्तथा वारं नक्षत्रं विष्णुरेव च। योगश्च करणं विष्णु: र्सव विष्णुमयं जगत।” इनमें से रविवार भगवान विष्णु को सर्वाधिक प्रिय है, इसलिए रविवार को विष्णु प्रिया तुलसी को नहीं तोड़ना चाहिए, ऐसा विधान बना। कई जगहों पर क्रूर वार होने के कारण मंगलवार को भी तुलसी नहीं तोड़ते। मुहूर्त लोक पर अधिक आधारित एवं प्रचलित होते हैं, इसलिए तुलसी तोड़ने के सन्दर्भ में भी लोक की प्रधानता प्रचलित हुई।

सभी जगहों पर रविवार को तुलसी नहीं तोड़नी चाहिए, यह धारणा प्रचलित नहीं है। जैसे विष्णु प्रधान धाम श्रीबद्रीनाथ एवं जगन्नाथ में भगवान के पूजन एवं श्रृंगार में प्रतिदिन तुलसी का ही प्रयोग होता है। यहां पर प्रतिदिन तुलसी तोड़ी जाती है और भगवान का पूजन-श्रृंगार किया जाता है। हमारे शास्त्रों ने लोक के आधार पर आचरण की व्यवस्था बनाई है। शास्त्र से अधिक लोक को प्रधानता दी है।

 

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