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दि राइजिंग न्यूज़

आउटपुट डेस्क।

इमाम हुसैन की शहादत को याद करने का दिन चेहल्लुम है। चेहल्लुम मोहर्रम के चालीसवें पर इमाम हुसैन की शहादत को याद करने के लिए मनाया जाता है। करबला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन मानवता की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे।  इस मातम के दिन में भी ताजिया जुलूस आदि निकलते हैं। इमाम हुसैन जब करबला के मैदान में थो तो उनके साथ मात्र 72 हकपरस्त यानी वफादार सैनिक थे वहीं दूसरी ओर यजीद की 22000 से भी अधिक लोगों की हथियारबंद सेना थी।

सत्य के लिए गवाह चेहल्लुम है

करबला की जंग समय के हिसाब से तो छोटी सी जंग थी लेकिन इस्लाम के इतिहास में करबला की लड़ाई सत्य और असत्य या अन्याय और न्याय के बीच की लड़ाई बनकर सामने आई। गिनती के चंद लोगों के साथ ईमान, सत्य और न्याय के लिए लड़ते हुए इमाम हजरत हुसैन इस दिन शहादत को प्राप्त हुए थे लेकिन उन्होंने दुनिया को एक नई रोशनी की राह जरूर दिखा दी थी।

करबला के मैदान में नवासा-ए-रसूल हजरत इमाम हुसैन ने अपने 72 हकपरस्त सैनिकों के काफिले के साथ दीन-ए-रसूल को बचाने के लिए अपनी और अपने घर के खानदान वालों के साथ कुर्बानी दी थी। करबला में ही इमाम हुसैन के साथ सभी सैनिक और छोटे-छोटे बच्चे भूख-प्यास आदि के कारण शहीद हो गये थे। यजीदियों ने काफिले में मौजूद औरतों और महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया जिसके बाद उन पर जुल्मों और सितमों का दौर शुरु हुआ था और उनके टेंटों में आग लगा दी गई थी।

हजरत-ए-जैनुल आब्दीन के दिन यजीदियों के कब्जे से निकले लोग करबला पहुँचे और शोहदा-ए-करबला की कब्र की जयारत यानी की दर्शन किये। उनके दर्शन करने का दिन इमाम हुसैन की शहादत का चेहल्लुम यानी चालीसवां दिन था। तभी से हजरत इमाम हुसैन की शहागत की याद में शादात के 40वें दिन चेहल्लुम मनाया जाता है।

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