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दि राइजिंग न्यूज़

आउटपुट डेस्क।

 

उर्दू के अजीम शायर जोश मलीहाबादी आज ही के दिन पैदा हुए थे। जानकारों का कहना है कि वह एक ऐसे शायर थे जो कली के टूटने पर भी पूछ लिया करते थे कि कहीं कोई इरशाद उनके लिए तो नहीं किया गया। इतना मानूस हूं फितरत से कली जब चटकी... झुक के मैंने ये कहा मुझ से कुछ इरशाद किया?, आइये जोश मलीहाबादी की 120वीं जयंती पर इस शख्सियत के बारे में जानते हैं...    

 

पिता की मौत ने तोड़ दिया, बीच में छूटी पढ़ाई 

जोश मलीहाबादी को शब्बीर हसन खान के नाम से भी जाना जाता है। उनकी पैदाइश 1898 में ब्रिटिशकालीन भारत की है। हैरानी की बात यह है कि जोश ने बचपन में घर पर ही अरबी, उर्दू और अंग्रेजी की शिक्षा ग्रहण की। बाद में आगरा के सेंट पीटर्स कॉलेज में उन्हें दाखिला दिलाया गया। 1916 में पिता की मौत ने जोश को तोड़ दिया और उन्हें बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी। दिलचस्प बात यह है कि उनके दादा, परदादा और चाचा सभी कवि थे। मलीहाबादी ने भी आगे चलकर इसी परंपरा को विकसित किया।

शायर-ए-इंकलाब का खिताब

सन 1925 में मलीहाबादी ने ओसमानिया यूनिवर्सिटी हैदराबाद में ट्रांसलेशन करना शुरू किया था। इस नौकरी से उन्हें हाथ धोना पड़ा क्योंकि उन्होंने हैदराबाद के निजाम के खिलाफ नज्म लिख दी थी। इस वाकये के बाद उन्होंने कलीम नाम से एक मैगजीन शुरू की जिसमें उन्होंने देश की आजादी के लिए आर्टिकल लिखना शुरू कर दिया। उनकी कविता हुसैन और इंकलाब को शायर-ए-इंकलाब का खिताब मिला। इसके बाद वह सक्रिय रूप से आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। कहा जाता है कि वह जवाहर लाल नेहरू  के करीबी लोगों में से एक थे। 1947 में जब ब्रिटिश राज खत्म हुआ तब वह आज-कल पब्लिकेशन के संपादक बने।

 

विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए थे मलीहाबादी

हालांकि विभाजन के कुछ समय बाद मलीहाबादी पाकिस्तान चले गए और कराची में अंजुमन ए तरक्की ए उर्दू के लिए काम करने लगे। वह उर्दू के लिए अपनी जान देने वाले लोगों में से एक थे। उन्होंने लिखा था...आओ काबे से उठें सू ए सनम खाना चलें... ताबा ए फक्र कहे सवलत ए शाहाना चलें।

केवल 3 बार भारत आए थे मलीहाबादी

पाकिस्तान में बसने के बाद मलीहाबादी का भारत आना-जाना बिल्कुल कम हो गया था। उनके बारे में दावा किया जाता है कि वह पाकिस्तान में बसने के बाद केवल 3 बार भारत आए और ये तीनों वजहें बहुत बड़ी थीं। पहली बार वह भारत तब आए जब मौलाना आजाद की मौत हुई। दूसरी बार वह भारत तब आए जब पंडित नेहरू का इंतकाल हुआ और तीसरी बार किसी खास वजह से जिसमें इंदिरा गांधी से मुलाकातें भी शामिल थीं।

 

भाषाई शुद्धता के लिए सनक

कौन सा शब्द किस तरह बोला जाए, कब बोला जाए और क्यों...इस सब को लेकर जोश पागलों की हद तक जा सकते थे। इस मामले में उन्होंने देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक को नहीं बख्शा। वो हर किसी को, कभी भी, कहीं भी टोक देते थे। गलत उच्चारण और इस्तेमाल, दोनों उन्हें बेतरह नागवार गुजरते। कहते हैं जब नेहरू को उन्होंने अपनी एक किताब दी तो जवाब में नेहरू ने उन्हें कहा “मैं आपका मशकूर(जिसका शुक्रिया अदा किया जाए) हूं।” उन्होंने नेहरू को ठीक किया और कहा “आपको कहना चाहिए, मैं आपका शाकिर(शुक्रगुजार) हूं।”

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