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दि राइजिंग न्यूज़

आउटपुट डेस्क।

 

आज पूर्ण चंद्र ग्रहण है। यह सदी का सबसे लंबा चंद्रग्रहण होगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार चंद्र ग्रहण पर देवी-देवताओं के दर्शन को अशुभ माना जाता है। ग्रहण में सभी मंदिर के कपाट को बंद कर दिए जाते है। चंद्र ग्रहण को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं है। आइए जानते हैं शास्त्रों के अनुसार चंद्र ग्रहण की पूरी कहानी।

 

समुद्र मंथन के दौरान की है कहानी

पौराणिक मान्यता के अनुसार जब समुद्र मंथन चल रहा था तब उस दौरान देवताओं और दानवों के बीच अमृत पान के लिए विवाद पैदा शुरू होने लगा, तो इसको सुलझाने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया। मोहिनी के रूप से सभी देवता और दानव उन पर मोहित हो उठे। तब विष्णु ने देवताओं और दानवों को अलग-अलग बिठा दिया। तभी एक असुर को विष्णु की इस चाल पर शंका हुई तो वह असुर छल से देवताओं की लाइन में आकर बैठ गए और अमृत पान करने लगा।

राहू केतु के दुश्मन हैं सूर्य-चन्द्रमा

देवताओं की पंक्ति में बैठे चंद्रमा और सूर्य ने दानव को ऐसा करते हुए देख लिया। इस बात की जानकारी उन्होंने विष्णु को दी, जिसके बाद विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से राहू का सिर धड़ से अलग कर दिया लेकिन राहू ने अमृत पान किया हुआ था, जिसके कारण उसकी मृत्यु नहीं हुई और उसके सिर वाला भाग राहू और धड़ वाला भाग केतू के नाम से जाना गया। इसी वजह से राहू और केतु सूर्य और चंद्रमा को अपना शत्रु मानते हैं और पूर्णिमा के दिन चंद्रमा का ग्रास कर लेते हैं। इसलिए चंद्र ग्रहण होता है।

 

ज्योतिष में राहु और केतु को छाया ग्रह माना जाता है। अगर किसी की कुंडली में राहु-केतु बुरे भाव में जाकर बैठ जाता है तो उसको जीवन में बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इनकी ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सूर्य और चंद्रमा भी इसके प्रभाव से नहीं बच पाते। वहीं खगोल शास्त्र के अनुसार जब पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य के बीच में आती है तो चंद्र ग्रहण होता है।

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