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दि राइजिंग न्यूज़

आउटपुट डेस्क।

आपने देखा होगा कि जब भी कहीं हवन या किसी भी धार्मिक अनुष्ठान में मंत्र पाठ होता है तो उसमें “स्वाहा” कहकर ही हवन सामग्री, अर्घ या भोग भगवान को अर्पित करते हैं। ऐसा हर किसी अनुष्ठान, हवन में मंत्र के अंत में किया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर मंत्र के अंत में बोले जाने वाले शब्द स्वाहा का अर्थ क्या है।

स्वाहा का अर्थ है – सही रीति से पहुंचाना। दूसरे शब्दों में कहे तो जरूरी भौगिक पदार्थ को उसके प्रिय तक पहुंचाना। दरअसल कोई भी यज्ञ तब तक सफल नहीं माना जा सकता है जब तक कि हवन का ग्रहण देवता न कर लें, लेकिन देवता ऐसा ग्रहण तभी कर सकते हैं जबकि अग्नि के द्वारा स्वाहा के माध्यम से अर्पण किया जाए। श्रीमद्भागवत तथा शिव पुराण में स्वाहा से संबंधित वर्णन आए हैं। इसके अलावा ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि वैदिक ग्रंथों में अग्नि की महत्ता पर अनेक सूक्तों की रचनाएं हुई हैं।

ये हैं पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्वाहा दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं। इनका विवाह अग्निदेव के साथ किया गया था। अग्निदेव अपनी पत्नी स्वाहा के माध्यम से ही हविष्य (पदार्थ जिसकी हवन में आहुति दी जा सकती हो या दी जाने को हो) ग्रहण करते हैं तथा उनके माध्यम से यही हविष्य आह्वान किए गए देवता को प्राप्त होता है।

भगवान कृष्ण ने दिया था वरदान

स्वाहा की उत्पत्ति से एक दूसरी रोचक कहानी भी जुड़ी हुई है। इसके अनुसार, स्वाहा प्रकृति की ही एक कला थी, जिसका विवाह अग्नि के साथ देवताओं के आग्रह पर सम्पन्न हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं स्वाहा को ये वरदान दिया था कि केवल उसी के माध्यम से देवता हविष्य को ग्रहण कर पाएंगे। यज्ञीय प्रयोजन तभी पूरा होता है जबकि आह्वान किए गए देवता को उनका पसंदीदा भोग पहुंचा दिया जाए।

 

 

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