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दि राइजिंग न्‍यूज

संजय शुक्ल

 

कर्नाटक फतेह कर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस को हाशिए पर पहुंचा दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का थ्री पी कांग्रेस यानी परिवार, पुडुचेरी और पंजाब का दावा हकीकत हो गया। मगर दक्षिण भारत के नतीजों पर गौर करें तो इससे उत्तर भारत में भाजपा के खिलाफ संयुक्त विपक्ष की थ्योरी को बल मिलता है। कारण है कि भारतीय जनता पार्टी ने भले ही बड़ी जीत हासिल की, लेकिन कांग्रेस व जेडीएस अलग चुनाव लड़े। अगर यह विपक्ष संयुक्त होता तो शायद नतीजे ऐसे तो न होते। यानी अब कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का समय है तो विपक्ष के लोकसभा चुनाव के लिए अपनी रणनीति तय करने का।

कुशल चुनाव प्रबंधन और काडर स्तर का संगठन और दमदार रणनीति के चलते भाजपा का विजय रथ लगातार आगे बढ़ रहा है। इस प्रबंधन के आगे कांग्रेस पूरी तरह से बेदम दिखाई देती है। काडर है न संगठन। संगठन जो है, उसमें आंतरिक विरोध ज्यादा है। सबसे ज्यादा दिक्कत तो कुछ दिन पहले खुद को प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार बताने वाले कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के सामने है। ऐसे में देखना होगा कि अब आगे भाजपा के खिलाफ विपक्ष क्या रणनीति बनाता है। राजनैतिक विश्लेषकों के मुताबिक अब भाजपा के खिलाफ संयुक्त विपक्ष बनाने की मुहिम को इन परिणामों से बल जरूर मिलेगा। कारण है कि कर्नाटक में अल्पसंख्यक से लेकर लिंगायत यानी धर्म, भाषा –जाति सारे कार्ड खेले गए।

जेडीएस के किंगमेकर होने की अटकलें भी लग रही थीं, लेकिन ऐसा कुछ न हुआ। भाजपा के खिलाफ कांग्रेस तथा जनता दल (एस) दो पार्टियों के होने के कारण वोटों का विभाजन भी हुआ और इसका फायदा भाजपा के पक्ष में रहा है। हालांकि जनता दल (एस) ने अपनी पकड़ को फिर साबित किया, लेकिन वह किंग मेकर की भूमिका में भी नहीं रह पाईं।

ऐसे में इन परिणामों के बाद अब राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड में होने वाले चुनाव के लिए विपक्ष के एकजुट होने के आसार बढ़ते दिख रहे हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजपार्टी के गठबंधन को अब ज्यादा महत्व मिलना तय है तो कांग्रेस की हालत और पतली होगी। बड़ा सवाल यही होगा कि भाजपा की प्रचंड लहर के आगे कांग्रेस खुद राष्ट्रीय पार्टी होने का अस्तित्व बचा पाएगी या फिर वह क्षेत्रीय क्षत्रपों की अगुवाई में ही भाजपा से मुकाबिल होगी।

 

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