Sanjay Dutt invited Ranbir and Alia For Dinner

दि राइजिंग न्यूज़

संजय शुक्ल 

 

प्रदेश से लेकर केंद्र की सरकार तक। देश के 75 फीसद राज्यों में शासन और उपचुनावों को लेकर प्रचार की कमान संभालने वाले भाजपा के तेज तर्रार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ताबड़तोड़ जनसभाएं। मगर नतीजा सामने आया तो जमीन ही खिसक गई। चुनाव के बाद से दोनों ही सीटों को जीतने की डींग भरने वाले भाजपा नेता का तमाम जोश दोपहर ढलते ढलते ठंडा पड़ गया। चुनाव परिणाम समीक्षा और मंथन की बातें होने लगीं। जी हां, बात  प्रदेश की दो लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव की है। एक सीट सीधे मुख्यमंत्री की थी तो दूसरी उप मुख्यमंत्री की। गोरखपुर सीट पर पिछले साढ़े तीन दशक से भाजपा का कब्जा था और विपरीत परिस्थितियों में भी भाजपा यहां जीतती रहीं लेकिन इस बार उसे हार का मुंह देखना पड़ा।

 

खास बात यह है कि उपचुनाव वाली दोनों ही लोकसभा सीटों पर पिछले लोकसभा चुनाव में सपा–बसपा को करीब 45 फीसद वोट मिले थे। जबकि भारतीय जनता पार्टी को करीब 39 फीसद मत प्राप्त हो गए थे। बसपा –सपा का समझौता होने के बाद मुकाबला 45 बनाम 39 का हो गया था। मगर मौजूदा हालात में भाजपा के पक्ष दिखाई दे रहे थे। उप चुनावों के नतीजों ने सारे ही समीकरणों को दरकिनार कर दिया।

दरअसल इन दोनों ही सीटों पर उपचुनाव को 2019 के सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा था। दोनों सीटों पर सत्तारुढ़ भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर थी। कारण था कि एक सीट योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से खाली हुई थी तो दूसरी उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या की। इन दोनों कद्दावर नेताओं के अलावा करीब ढाई दशक बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी सारे गिले शिकवे भुलाकर एक साथ भाजपा के विरोध में थे। हालांकि कांग्रेस इसमें नहीं शामिल थी मगर सपा–बसपा के समझौते को बेर–केर का संग, सांप नेवले की दोस्ती तथा चोर – चोर . .  की संज्ञा दी गई। चुनाव के नतीजे आने के बाद भाजपा की हालत एक बार फिर एक दशक पुराने शाइनिंग इंडिया वाली हो गई। वहीं इस चुनाव से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजपार्टी के लिए संजीवनी का काम किया। साथ ही 2019 में लोकसभा चुनाव का चुनावी गणित भी तय होता दिखाई दे रहा है। इन स्थितियों में अबतक बच रही कांग्रेस भी अब इसका अंग बनने को लालायित दिख रही है।

मायावती का दिखा असर

बहुजन समाज पार्टी के उपचुनाव में न उतरने तथा भाजपा को हराने वाले को काडर वोट दिए जाने की घोषणा को भी भारतीय जनता पार्टी बहुत हल्के में ले रहीं थी। हालांकि चुनाव नतीजे आने के बाद यह साफ हो गया कि बसपा सुप्रीमो मायावती का अपने काडर वोटों पर नियंत्रण बरकरार है और पिछड़े –दलित वोट बैंक पर उनकी पकड़ कहीं कम नहीं हुई है। वहीं भाजपा के कद्दावर नेताओं वाली सीटों पर पटखनी देने के बाद समाजवादी पार्टी भी इसके लिए बसपा का शुक्रिया अदा करने में कतई नहीं हिचकी। नेता प्रतिपक्ष राम गोविंद चौधरी तो जीत पक्की होते ही बसपा सुप्रीमो से मिलने पहुंचे और साधुवाद दिया। इस गर्मजोशी ने अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों की जमीन को भी मजबूती देना शुरू कर दिया है। सपा –बसपा के इस गठबंधन की जीत से भाजपा भी हतप्रभ है।    

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