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सवाल तो रहबरी का है  ..

Editorial | Last Updated : May 17, 2018 01:27 PM IST

Editorial om Political war in Karnataka Between Congress and BJP


दि राइजिंग न्यूज़

संजय शुक्ल

 

कर्नाटक में चल रहे सत्ता संग्राम से देश में एक नई बहस शुरु हो गई है। सरकार भले ही भाजपा की बने या फिर कांग्रेस –जेडीएस गठबंधन की लेकिन, सवाल यह कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग क्या किसी पक्ष के प्रति बायस नहीं है। यही नहीं, इसमे लोकतंत्र कहां रह गया जबकि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दम भरते नहीं थकते। सुप्रीम कोर्ट से लेकर चुनाव आयोग तक, तमाम आरोप लगाने वाली कांग्रेस एक बार फिर लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगा रही है। इस पर सारी हकीकत सामने है और अब यह बहस आम लोगों में चर्चा बन गई है। ऐसे में संवैधानिक संस्थाओं और वहां पर आसीन लोगो को लेकर प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं। मामला फिर एक बार सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है और अब इसका जवाब भी वहीं से मिलने की उम्मीद की जा रही है।

 

दरअसल इन स्थितियों की मुख्य वजह देश के कई राज्यों में पूर्व में हुए चुनाव और वहां गठित सरकारें ही हैं। गोवा, मेघायल और बिहार तीनों राज्यों में सरकार के गठन का मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा। न्यायालय ने सुनवाई के बाद फैसला भी दिया और गाइड लाइन भी। मगर न्यायालय की यह गाइड लाइन सुविधानुसार इस्तेमाल हो रही है। कर्नाटक में भाजपा को बड़े दल होने के नाते राज्यपाल ने निमंत्रण दिया और गुरुवार सुबह मुख्यमंत्री पद की शपथ भी दिला दी। जबकि भाजपा बहुमत से आठ सीट कम हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस और जेडीएस गठबंधन के पास 116 सीटें हैं लेकिन राज्यपाल ने बड़ी पार्टी होने के नाते भाजपा को न्यौता दिया। सवाल यह भी है कि जब बहुमत है नहीं तो फिर 15 दिन का समय किसलिए दिया गया। यानी पंद्रह दिन में बहुमत के लिए जरूरी विधायकों का इंतजाम करने का समय।

अब राजभवन ही विधायकों की खरीद फरोख्त के लिए समय देगा, संविधान के मायने क्या रह जाएंगे। वैसे जिन लोगों के समर्थन की बात कही जा रही थी, उनमें 114 शपथग्रहण के बाद कर्नाटक विधानसभा के बाहर धरना –प्रदर्शन कर रहे थे। जबकि कांग्रेस के चार विधायक जरूर लापता हो गए थे। जानकारों के मुताबिक किसी दल में विघटन के लिए दो तिहाई सदस्यों का पार्टी से अलग होना जरूरी है। ऐसे में किस आधार पर भाजपा को बुलावा दिया गया। सवाल यह भी है कि फिर गोवा में ऐसा क्यों नहीं किया गया। खास बात यह है कि देश के 21 राज्यों में राज्यपाल पद पर भाजपा के पुराने धुरंधर नेता ही काबिज हैं। इस फैसले के बाद एक बार फिर संवैधानिक पद को लेकर कयास लगने लगे हैं। उल्लेखनीय है कि भारतीय जनता पार्टी इसके लिए कांग्रेस को ही जिम्मेदार बता रही है मगर भूल जाती है कि उत्तर प्रदेश में राज्यपाल रोमेश भंडारी ने जब जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई थी, उसके बाद क्या हुआ था।

 

अब कर्नाटक में भाजपा के येदुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ भले ले ही है लेकिन शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई अहम हो गई है। बुधवार-गुरुवार आधी रात बाद शुरू हुई उच्चचम में सुनवाई के बाद भाजपा से भी समर्थन करने वाले विधायकों की सूची तलब की गई है। ऐसे में यह सूची अपने आप में पहेली बन गई है। कारण है कि एक तरफ 114 विधायक (यानी बहुमत से दो ज्यादा) धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। इनमें दो निर्दलीय भी शामिल हैं। जबकि 104 विधायक भाजपा के हैं। चार विधायक कांग्रेस के बैंगलुरू के रिसार्ट से लपाता हो चुके हैं। यही नहीं, राज्यपाल के फैसले को भी उच्चतम न्यायालय में चुनौती मिल रही है और इसे किसी मायने में लोकतंत्र या संविधान के अनुकूल नहीं माना जा सकता।



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