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Guest Column | 1-Aug-2016 03:54:29 PM
भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम



 


प्रशांत मिश्रा

भारतीय राजनीति में आजादी के इतने वर्षों बाद भी महिलाओं की भागीदारी बहुत कम बनी हुई है। वास्तव में भारत की आधी आबादी का एक बहुत बड़ा भाग अभी भी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के पीछे भाग रहा है। विकास की धारा इन्हें प्रभावित नहीं कर पाई है। आवश्यकता इस बात की है कि इन्हें विकास की मुख्य धारा से जोड़ा जाय। तमाम लक्ष्मण रेखाओं को लांघकर आज की महिला ने अपना अस्तित्व कायम किया है। भारत की राजनीति में वर्षों से पुरुष ही राज करते आए हैं। हालांकि भारत उन देशों में से एक है जिसने दशकों पहले ही अपनी बागडोर इंदिरा गांधी के हाथों सौंप दी थी लेकिन आज भी हर स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम रहा है। भारतीय राजनीति में महिला भागीदारी बहसों और सेमिनारों में ही रहती है। जयललिता, सोनिया, ममता, मायावती जैसी नेता भारतीय राजनीति के शिखर पर हैं वहीं नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर, अन्ना हजारे आंदोलन की नेता के रूप में उभरे हैं।


देश के प्रमुख राजनीतिक दल भाजपा व कांग्रेस ने पार्टी के संगठन में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव पास कर रखा है लेकिन इस नियम का ईमानदारी से पालन नहीं हो पाता। 29 राज्यों वाले देश में कांग्रेस पार्टी से सिर्फ एक दिल्ली में शीला दीक्षित मुख्यमंत्री हुई है जबकि भाजपा से मध्यप्रदेश से उमा भारती मुख्यमंत्री हुई है राजस्थान से वसुन्धरा राजे मुख्यमंत्री है। उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता ने अपने दम पर सरकार चलाई है। भारत में पहली बार अक्टूबर 1963 में सुचेता कृपलानी को देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। इसी तरह 13 जून 1995 को मायावती ने भाजपा के समर्थन से पहली बार उत्तरप्रदेश में सरकार बनाई और देश की पहली दलित मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल किया। इसी तरह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने वामपंथियों की 34 साल पुरानी सरकार को हटाकर अपना झण्ड़ा फहरा दिया।


हालांकि महिलाएं राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर ठीक- ठाक संख्या में राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करती हैं। लेकिन इन राजनीतिक दलों में भी उच्च पदों पर महिलाओं की उपस्थिति कम ही है। उल्लेखनीय है कि भारत में सबसे ज्यादा उन्नती कर रहे राज्य कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिल नाडू में बहुत कम महिला राजनीतिज्ञ सामने आई हैं जबकि उत्तर प्रदेश या बिहार में उनकी संख्या कहीं ज्यादा है। भारत में महिलाओं का इतिहास काफी गतिशील रहा है। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी कुछ महिलाओं ने राजनीति, साहित्य, शिक्षा और धर्म के क्षेत्रों में सफलता हासिल की। आधुनिक भारत में महिलाएं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोक सभा अध्यक्ष, प्रतिपक्ष की नेता आदि जैसे शीर्ष पदों पर आसीन हुई हैं। इंदिरा गांधी जिन्होंने कुल मिलाकर पंद्रह वर्षों तक भारत के प्रधानमंत्री के रूप में सेवा की, दुनिया की सबसे लंबे समय तक सेवारत महिला प्रधानमंत्री हैं। सरोजिनी नायडू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला और भारत के किसी राज्य की पहली महिला राज्यपाल थीं।


भारत में महिला साक्षरता दर धीरे- धीरे बढ़ रही है लेकिन यह पुरुष साक्षरता दर से कम है। हालांकि ग्रामीण भारत में लड़कियों को आज भी लड़कों की तुलना में कम शिक्षित किया जाता है। भारत में अपर्याप्त स्कूली सुविधाएं भी महिलाओं की शिक्षा में रुकावट है। हालांकि भारत में महिलाएं अब सभी तरह की गतिविधियों जैसे कि शिक्षा, राजनीति, मीडिया, कला और संस्कृति, सेवा क्षेत्र, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आदि में हिस्सा ले रही हैं। विभिन्न स्तर की राजनीतिक गतिविधियों में भी महिलाओं का प्रतिशत काफी बढ़ गया है। हालांकि महिलाओं को अभी भी निर्णयात्मक पदों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है। राजनीतिक दलों के भेदभावपूर्ण रवैये के बावजूद मतदाता के रूप में महिलाओ की भागीदारी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। महिलाओं के मुद्दों के प्रति राजनीतिक दलों की गंभीरता महिला आरक्षण बिल को पास करने में असफलता से ही साफ हो जाती है। पार्टियों को महिला मतदाताओं की याद सिर्फ चुनाव के दौरान ही आती है और उनके घोषणापत्रों में किए गए वादे शायद ही कभी पूरे होते हैं।


किसी राजनीतिक दल की चुनावी सफलता में युवाओं के बजाए महिला मतदाता अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों को टिकट बांटते समय महिला उम्मीदवारों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। महिला उम्मीदवारों को टिकट नहीं देने के बारे में राजनीतिक दल कहते हैं कि महिलाओं में जीतने की काबिलियत कम होती है। परंतु राज्यसभा में तो विधान सभा सदस्य वोट डालते हैं फिर राजनीतिक दल महिलाओं को राज्यसभा चुनाव में क्यों नहीं खड़ा करते हैं। आज महिलाओं में आत्मगौरव, आत्मविश्वास व साहस का संचार हुआ है और देश के विकास में योगदान दे रही हैं। वर्तमान समय में भारत में महिलाओं के राजनीतिक विकास में अनेकानेक बाधायें हैं। महिलाओं में संकोच, महिलाओं की आर्थिक पराधीनता, महिलाओं में असुरक्षा का भय, राजनीतिक दलों में सत्ता प्राप्ति की प्रवृत्ति, खर्चीली चुनाव प्रणाली राजनीतिक विकास में बाधायें हैं। महिलाओं की बाधाओं को दूर कर उन्हें राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। लगभग सभी राज्यों में न सिर्फ महिलाओं के मतदान का प्रतिशत बढ़ा है बल्कि महत्वपूर्ण बात ये है कि कई राज्यों में मतदान के लिहाज से महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है। चुनावी राजनीति में महिलाएं अधिक सक्रिय दिखाई दे रही है। अब समय आ गया है कि राजनीतिक दल बदलाव की पहल करें।


वर्तमान में भी महिलाएं केन्द्रीय मंत्री, राज्य मंत्री, मुख्यमंत्री, महापौर और सांसदों के पद पर आसीन हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायतों में भी महिलाएं विभिन्न पदों पर आसीन हैं। सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून यानी अफस्पा को हटाने की मांग को लेकर 16 साल से अनशन कर रहीं मणिपुर की आयरन लेडी इरोम चानू शर्मिला ने घोषणा की कि वह अपना अनशन समाप्त कर देंगी और निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राज्य विधानसभा का चुनाव लड़ेंगी। अब उन्हें नहीं लगता कि उनके अनशन से अफस्पा हट पायेगा। लेकिन वह लड़ाई जारी रखेंगी। मणिपुर में विधानसभा चुनाव 2017 में होना है। शिक्षा, विज्ञान, खेल- कूद, व्यवसाय, सूचना- प्रौद्योगिकी, चिकित्सा और रजत पट आदि सभी क्षेत्रों में महिलाएं पुरुषों से अधिक योग्य सिद्ध हो रही हैं। मीडिया, पत्रकारिता एवं जनसंचार के क्षेत्र में भी महिलाओं का वर्चस्व कायम है।


किसी भी देश की वांछित प्रगति के लिए उस देश की महिलाओं की भागीदारी आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है। भारत की आधी शक्ति एवं क्षमता होने के बावजूद राजनीतिक सामाजिक आर्थिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी कम रही है। भारतीय राजनीति में महिलाएं आम चुनावों में बहुत कम संख्या में भाग लेती हैं तथा जो भाग लेती हैं वे प्रायः राजनीति की ऊँची कुर्सी प्राप्त करने में असमर्थ रहती हैं। भारत की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी और देश के महत्वपूर्ण पदों पर उनकी उपस्थिति नहीं के बराबर है। आज का प्रदूषित राजनीतिक वातावरण महिलाओं को राजनीतिक क्षेत्र के लिए किसी प्रकार का आकर्षण नहीं देता इसके उपरान्त भी भारतीय महिलायें अपनी राजनीतिक चेतना की अभिव्यक्ति करना चाहती हैं। भारत के राजनीतिक क्षेत्र में कुछ महिलाओं ने स्वयं के बलबूते पर महत्वपूर्ण स्थिति बनाई है।

 

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