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दि राइजिंग न्यूज़

लखनऊ।

 

पेपर बनाने के लिए पेड़ काटे जाते हैं...पृथ्वी का वातावरण प्रभावित होता है जिसकी वजह से हम सांस नहीं ले पाते हैं...अब तक हमने यही सुना है, लेकिन ये आधी-अधूरी जानकारी है। जी हां, शायद आपको ये नहीं पता की जिस पेड़ को पेपर बनाने के लिए काटा जाता है उसे असल में पेपर इंडस्ट्री ही प्लांट करती है। ऐसा कहना है लखनऊ पेपर मर्चेंट एसोसिएशन के सदस्‍य रवि अग्रवाल का। एक अगस्‍त यानी पेपर डे पर पढ़िए दि राइजिंग न्‍यूज की पूरी रिपोर्ट-

देखिये प्रोसेस...

 

पेपर डे के मौके पर लखनऊ के लोहिया पार्क में लखनऊ पेपर मर्चेंट एसोसिएशन ने कागज़ को लेकर आम जन में फैलीं भ्रांतियां दूर की। रवि अग्रवाल ने कार्यक्रम में बताया कि पेपर इंडस्ट्री कागज बनाने के लिए खुद पेड़ लगाती है। पेड़ को पूरी तरह से डेवेलप होने में कम से कम पांच से छह साल लगते हैं और तबतक वो अच्छी खासी ऑक्सीजन दे चुका होता है। वे आगे बताते हैं कि पेड़ की मदद से केवल 23 प्रतिशत पेपर बनता है और बाकी रद्दी गला के और पुराने कागज को रीयूज करके नया पेपर बनाया जाता है।

वह कहते हैं कि देश में इतनी लकड़ी है ही नहीं कि उसे पेपर बनाने में इस्‍तेमाल किया जा सके। जितने पेड़ हम काटते हैं उससे कहीं ज्यादा हमें लगाने होते हैं। हमारी इंडस्ट्री फारेस्ट बेस्ड नहीं बल्कि एग्रो बेस्ड है। कागज को हम जितनी बार चाहें उतनी बार रिसाइकिल कर सकते हैं। इस जानकारी को मुहैया कराने के लिए कार्यक्रम में रवि अग्रवाल के साथ-साथ उनके साथी दिनेश मित्तल, संजय काबरा, राज कुमार अग्रवाल और विष्णु अग्रवाल मौजूद थे।   

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