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दि राइजिंग न्यूज़

नई दिल्ली।

 

हथियारों की वैश्विक स्तर पर खरीद के मामले में भारत को पीछे छोड़कर अब सऊदी अरब शीर्ष पर काबिज हो गया है। एक दशक से युद्धक समाग्री खरीद के मामले में भारत ने पहला स्थान गवां दिया है। हथियारों के खरीद-फरोख्त पर नजर रखने वाली स्टॉकहोम स्थित एक थिंक टैंक की ताजा जारी रिपोर्ट्स में यह कहा गया है कि साल 2014 से 2018 के बीच इस मामले में सऊदी अरब पहले स्थान पर पहुंच गया है।

 

पांच साल की इस अवधि में सऊदी अरब ने वैश्विक स्तर पर खरीदे गए हथियारों का 12 फीसदी हिस्सा अपने नाम किया। जबकि भारत 9.5 फीसदी के साथ इस लिस्ट में दूसरे स्थान पर काबिज रहा। यह खुलासा स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) द्वारा प्रकाशित नए आंकड़ों में हुआ है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 2014-18 और 2009-2013 के बीच भारत में रूसी हथियारों का निर्यात लगातार गिरा है। रिपोर्ट में इसका कारण पीएम नरेंद्र मोदी की विदेशी हथियारों पर देश की निर्भरता कम करने की कोशिश बताई गई है।

सिपरी द्वारा जारी इंटरनेशनल आर्म्स ट्रांसफर 2018 की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2014-2018 में भारत को जो हथियार निर्यात हुए उसमें 58 प्रतिशत हिस्सा रूस का था, जबकि तुलनात्मक रूप से 2009-2013 में यह 76 फीसदी था। रिपोर्ट में जारी आंकड़ों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेशी हथियारों पर देश की निर्भरता को कम करने की कोशिशों के मुताबिक 2009-2013 और 2014-2018 के बीच भारत के हथियारों के आयात में भारी कमी आई है। भारत के आयात में इस गिरावट का एक कारण आंशिक रूप से विदेशी निर्यातकों से लाइसेंस प्राप्त हथियारों की डिलीवरी में देरी भी रही है।

 

इस मामले में चीन 4.2 प्रतिशत हथियारों के आयात के साथ दुनिया का छठा सबसे बड़ा हथियार खरीदार है। 2009-13 और 2014-18 के बीच भारतीय हथियारों का आयात 24% गिर गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि रूसी और फ्रेंच हथियार निर्माताओं से लाइसेंस के तहत उत्पादित लड़ाकू जेट और पनडुब्बियों की डिलीवरी में देरी के कारण ऐसा हुआ है।

 

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