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दि राइजिंग न्यूज़

आउटपुट डेस्क।

 

शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने कभी न तो कोई चुनाव लड़ा और न ही कोई राजनीतिक पद स्वीकार किया। यहां तक कि उन्हें विधिवत रूप से कभी शिवसेना का अध्यक्ष भी नहीं चुना गया था लेकिन, इन सब के बावजूद महाराष्ट्र की राजनीति और खासकर मुंबई में उनका खासा प्रभाव था। अप्क्को बता दें कि उनका राजनीतिक सफर भी बड़ा अनोखा था। वो एक पेशेवर कार्टूनिस्ट थे और शहर के एक अखबार फ्री प्रेस जर्नल में काम करते थे। बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी।

 

शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने 1966 में शिवसेना का निर्माण किया और “मराठी मानुस” का मुद्दा उठाया। उस समय नौकरियों का अभाव था और बाल ठाकरे का दावा था कि दक्षिण भारतीय लोग मराठियों की नौकरियां छीन रहे हैं। गौरतलब है कि उन्होंने मराठी बोलने वाले स्थानीय लोगों को नौकरियों में तरजीह दिए जाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया।

दक्षिण भारतीयों के खिलाफ थे बाल ठाकरे

मुंबई स्थित कंपनियों को उन्होंने निशाना बनाया था लेकिन दरअसल उनका ये अभियान मुंबई में रह रहे दक्षिण भारतीयों के खिलाफ था क्योंकि शिवसेना के अनुसार जो नौकरियां मराठियों की हो सकती थी उन पर दक्षिण भारतीयों ने कब्जा कर रखा था।

 

ठाकरे का तर्क था कि जो महाराष्ट्र के लोग हैं उन्हें नौकरी मिलनी चाहिए। शिवसेना पर राजनीति में हिंसा और भय के इस्तेमाल का बार-बार आरोप लगा लेकिन, बाल ठाकरे का कहना था, "मैं राजनीति में हिंसा और बल का प्रयोग करूंगा क्योंकि वामपंथियों को यही भाषा समझ आती है और यह कुछ लोगों को हिंसा का डर दिखाना चाहिए तब ही वो सबक सीखेंगे।"

हिंसा का सहारा लेते थे ठाकरे

धीरे-धीरे मराठी युवा शिवसेना में शामिल होने लगे। आपको बता दें कि बाल ठाकरे ने अपनी पार्टी का नाम शिवसेना 17वीं सदी के एक जाने माने मराठा राजा शिवाजी के नाम पर रखा था। शिवाजी मुगलों के खिलाफ लड़े थे। बाल ठाकरे ने जमीनी स्तर पर अपनी पार्टी का संगठन बनाने के लिए हिंसा का सहारा लेना शुरू कर दिया। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों, आप्रवासियों और यहां तक कि मीडियाकर्मियों पर शिवसैनिकों के हमले आम बात हो गई थी। धीरे-धीरे मुंबई के हर इलाक़े में स्थानीय दबंग युवा शिवसेना में शामिल होने लगे।

 

एक “गॉडफॉदर” की तरह बाल ठाकरे हर झगड़े सुलझाने लगे। लोगों को नौकरियां दिलवाने लगे और उन्होंने आदेश दे दिए कि हर मामले में उनकी राय ली जाए। यहां तक की फिल्मों के रिलीज में भी उनकी मनमानी चलने लगी।

धीरे-धीरे बढ़ी ताकत

बाल ठाकरे के जीवन से जुड़ी कई कल्पित कहानियां प्रचलित होने लगीं। कहा गया कि वो जर्मनी के पूर्व तानाशाह हिटलर के प्रशंसक हैं। एक पत्रिका में उनके हवाले से ये खबर दी गई थी लेकिन उन्होंने न तो इसकी पुष्टि की और न ही इसका खंडन किया।

 

धीरे-धीरे मुंबई म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के चुनाव में उनकी पार्टी का प्रदर्शन बेहतर होने लगा लेकिन अभी भी पार्टी को बड़ी राजनीतिक कामयाबी नहीं मिल पा रही थी। शिवसेना का प्रभाव मुंबई और इसके आस-पास के इलाकों तक ही सीमित है और राज्य के दूसरे इलाकों में पार्टी का कुछ खास असर नहीं है। बाल ठाकरे 80 और 90 के दशक में तेजी से उभरे क्योंकि उस समय हिंदुत्व का मुद्दा सिर चढ़ कर बोल रहा था और ठाकरे कट्टर हिंदुत्व के समर्थक थे।

हिंदुत्व का दामन

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शुरूआती दौर में सत्ताधारी कांग्रेस ने शिवसेना को या तो नजरअंदाज किया या फिर कई मामलों में तो वामपंथियों जैसे अपने राजनीतिक विरोधियों को समाप्त करने के लिए शिवसेना को प्रोत्साहित किया लेकिन, 80 के दशक के दौरान शिवसेना एक बड़ी राजनीतिक शक्ति बन गई थी जो राज्य में सत्ता हासिल करने के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रही थी। इस दौरान बाल ठाकरे ने दक्षिणपंथी वोटरों को लुभाने के लिए हिंदुत्व का दामन थाम लिया।

अयोध्या मामला 

1992 में उत्तर प्रदेश के अयोध्या में बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने के बाद मुंबई में हिंदु और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे हुए जो कई हफ्तों तक चले। इन दंगों में शिवसेना और बाल ठाकरे का नाम बार-बार लिया गया। दंगों में कुल 900 लोग मारे गए थे। सैंकड़ों लोगों ने दंगों के बाद मुंबई छोड़ दी और फिर कभी लौट कर नहीं आए।

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