FIR Registered Against Singer Abhijeet Bhattacharya For Misbehavior From Woman

दि राइजिंग न्यूज़

पटना।

 

राष्ट्रीय लोक समता पार्टी प्रमुख और केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा इन दिनों सुर्ख़ियों में छाए हुए हैं। गुरुवार को एनडीए भोज में ना शामिल होने के के कारण को लेकर वो चर्चा का विषय बने हुए हैं। आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में सीटों के बंटवारे को लेकर सभी पार्टियों में मंथन चल रहा है।

 

आज तड़के पटना पहुंच कर उपेंद्र कुशवाहा ने उनके एनडीए गठबंधन से अलग होने की उठ रही अफवाहों का खंडन किया है। उन्होंने कहा कि कल फ्लाइट छूटने की वजह से वह भोज में शामिल नहीं हो पाए। लेकिन उनके भोज में शामिल नहीं होने को इतना बड़ा मामला क्यों बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भोज में सिर्फ मैं ही नही बल्कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी शामिल नहीं हुए, उनसे कितने लोगों ने सवाल किया है। यही नहीं कुशवाहा ने मीडिया के सवालों से बचने के लिए कहा कि बिहार में एनडीए एकजुट है और रहेगा।

वैसे राजनीति के जानकार उपेंद्र कुशवाहा की पूरी राजनीति को कुर्सी की चाल मान रहे हैं। माना ये भी जा रहा है कि उपेंद्र अपने दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहते हैं। वहीं जानकार यह भी मान रहे हैं कि जबसे जदयू भाजपा के करीब हुई है कुशवाहा लालू यादव के करीब होते जा रहे हैं। माना ये भी जा रहा है कि लालू यादव जब एम्स में भर्ती थे तब उपेंद्र कुशवाहा उनसे मिलने गए थे और तभी लालू यादव ने उन्हें महागठबंधन सरकार में उप मुख्यमंत्री बनाने का लालच दिया था।

 

राजग में खटपट की गुत्थी सुलझाने के क्रम में शिवसेना को मनाने में जुटी भाजपा की राह बिहार में भी आसान नहीं नजर आ रही है। जिस तरह से जदयू 25:15 के पुराने फार्मूले का राग अलाप रही है उससे साफ नजर आ रहा है कि भाजपा के लिए 2019 का लोकसभा चुनाव किसी भी हाल में आसान नहीं होगा। भाजपा के लिए मुश्किल यह है कि आगामी लोकसभा चुनाव में उसके पास जदयू को देने के लिए बहुत ज्यादा नहीं है। जबकि लोजपा और रालोसपा को डर है कि जदयू को साधने के चक्कर में भाजपा उनकी सीटों की संख्या घटा सकती है।

 

दरअसल बीते लोकसभा में जदयू राजग में नहीं थी। उस दौरान भाजपा 30, लोजपा 7 और रालोसपा 3 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। राजग को कुल 31 सीटें (भाजपा 22, लोजपा 6 और रालोसपा 3) हासिल हुई थी। भाजपा के लिए मुश्किल यह है कि न तो वह खुद और न ही दोनों सहयोगी जीती सीटों से कम पर मानने केलिए तैयार हैं। पार्टी को ओर से दबाव बनाने से पहले लोजपा ने जहां 7 सीटों पर दावा जता दिया है तो वहीं रालोसपा ने संदेश दिया है कि इस बार वह तीन सीटों पर नहीं मानेगी। जाहिर तौर पर इस परिस्थिति में अगर तीनों दल अपनी जीती सीटों पर भी मान गए तो जदयू को लडने के लिए महज 9 सीटें मिलेंगी। इनमें से ज्यादातर ऐसी सीटें हैं जहां राजद का व्यापक प्रभाव है।

 

इस मामले में बिहार में भाजपा दो धड़े में बंट गई है। डिप्टी सीएम सुशील मोदी खेमा लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल करने के लिए जदयू के लिए त्याग करने की सलाह दे रहा है। जबकि मोदी विरोधी धड़े का कहना है कि नीतीश को ज्यादा भाव देना ठीक नहीं। मोदी विरोधी एक नेता ने कहा कि इस समय नीतीश के पास कोई चारा नहीं है। जदयू-राजद की दोस्ती असंभव है। फिर भी अगर नीतीश ने राजग से हटने का निर्णय लिया तो लड़ाई त्रिकोणात्मक होगी और इसका सबसे अधिक लाभ भाजपा को होगा।

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