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दि राइजिंग न्‍यूज

अमित सिंह

लखनऊ।

नगर निगम के होनहार अधिकारी और संविदा पर काम कर रहीं संस्थाएं छह सौ कर्मचारियों का करीब 19 करोड़ रुपये डकार गए हैं। यह पैसा इन कर्मचारियों की भविष्य़ निधि खातों में पहुंचना था लेकिन बैंक से वेतन का भुगतान होने के बावजूद पीएफ खाते खोले तो गए लेकिन उसमें पैसा नहीं जमा कराया गया। दरअसल इस घोटाले का खुलासा एक शिकायत की जांच पर हुआ।  आरोप है कि अफसरों की सांठसांठ से नगर निगम में काम करने वाली 50 से अधिक कार्यदायी संस्थाओं ने दो सालों में ही 19 करोड़ रुपये के करीब रकम का गबन किया है। मामला खुलने के बाद नगर निगम कर्मचारी संघ ने सभी कार्यदायी संस्थाओं के कर्मचारियों का पूरा ब्योरा पीएफ की रकम के साथ सार्वजनिक किए जाने की मांग की है।

नगर निगम के विभिन्न जोनों में कार्यदायी संस्थाओं के जरिए स्वास्थ्य विभाग, कचरा निस्तारण विभाग, इलेक्ट्रिक विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग में बाबू और श्रमिक के तौर पर करीब साढ़े तीन हजार कर्मचारी काम कर रहे हैं। नगर निगम में यह ठेका व्यवस्था पिछले 10 सालों से चल रही है। संविदा पर काम करने वाले कर्मियों को न्यूनतम 7500 रुपये की मजदूरी भी दी जाती है। इसी में से पीएफ और ईएसआई के मदों में 2250 रुपये की कटौती की जाती है।

ऐसे हो रही है गड़बड़ी

नगर निगम कर्मचारी संघ के अध्यक्ष आनंद वर्मा के मुताबिक कार्यदायी संस्था के तहत काम कर रहे कर्मचारी का वेतन नगर निगम सीधे उसके खाते में नहीं दे रहा है। यहीं से गड़बड़ी का खेल चल रहा है। जबकि पिछले वर्ष शासन ने आदेश जारी कर यह स्पष्ट किया था कि सभी कर्मचारियों का वेतन सीधे उनके खाते में ही जाएगा। पिछले पांच सालों में किसी भी कार्यदायी संस्था ने एक भी कर्मचारी के पीएफ का पैसा तक जमा नहीं कराया। नगर निगम प्रशासन ने इसकी जानकारी मांगी, लेकिन किसी भी संस्था ने ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया है।

करोड़ों का है खेल

दो सालों के हिसाब से 3600 कर्मचारियों पर करीब 19.44 करोड़ रुपये का बैठता है। कर्मचारियों का आरोप है कि उनकी मेहनत की कमाई का पैसा नगर निगम के अफसरों और ठेकेदारों ने मिलीभगतकर अपनी जेबों में भरा है। तभी केवल कागजों में सूचनाएं ही मांगी गई किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई।

एजेंसियों का सत्यापन ही नहीं

सफाई कर्मचारियों के नाम पर भाड़े के मजदूर, उनमें कई बच्चे। कूड़ा निस्तारण के नाम पर भी एजेंसियों में सहायक के तौर पर कूड़ा बीनने वाले बच्चे। इन बच्चों को भले ही वेतन के नाम पर सौ से डेढ़ सौ रुपये प्रतिदिन मिल रहे हैं लेकिन इनके नाम पर ठेकेदार की जेब में साढ़े सात हजार रुपये पहुंच रहे हैं। इस पूरे गोरखधंधे में नगर निगम के जोन के अधिकारी ही नहीं बल्कि लेखा विभाग के अधिकारी भी शामिल हैं। दरअसल जिन लोगों को भुगतान किया जा रहा है, उनकी कोई सत्यापित रिपोर्ट भी लेखा विभाग या संबंधित जोन में उपलब्ध नहीं है। यही नहीं, पीएफ के गबन पर नगर निगम के लेखा अधिकारी इसकी शिकायत श्रम विभाग से करने की नसीहत जरूर दे रहे हैं।

"हमने एजेंसी को सभी मदों में धन दिया है। यह एजेंसी का दायित्व है कि वह इस मसले में कार्रवाई करे। यदि कर्मचारियों को इन सुविधाओं का पैसा नहीं मिला है तो वह श्रम विभाग में कार्रवाई के लिए शिकायत करें।" 

राजेंद्र सिंह

मुख्य लेखा एवं वित्त अधिकारी

 

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