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दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

कहा जाता है कि बाढ़ की स्थिति में नेवला, सांप, चूहा सभी एक ही डाल पर सवार होने में भी गुरेज नहीं करते। देश-प्रदेश के राजनैतिक माहौल की स्थिति भी कमोबेश ऐसे ही है। भारतीय जनता पार्टी के बढ़ते आधार ने विपक्षियों की नींद पहले ही उड़ा रखी है और अब राज्यसभा चुनाव में बीजेपी ने अपना नवां प्रत्याशी उतारकर विपक्षियों के सामने फिर दिक्कत पैदा कर दी है।

राज्यसभा चुनाव के ठीक पहले सपा के पुराने व दिग्गज नेता नरेश अग्रवाल व उनके पुत्र व समाजवादी पार्टी विधायक नितिन अग्रवाल के भाजपा में पहुंचने के बाद अब बहुजन समाजपार्टी के राज्यसभा प्रत्याशी भीमराव अंबेडकर के राज्यसभा पहुंचने को लेकर कयास लगने लगे हैं।

दरअसल, नरेश अग्रवाल व उनके पुत्र ने समाजवादी पार्टी से नाता ही नहीं तोड़ा बल्कि वह भाजपा के पक्ष में मतदान करने की घोषणा भी कर चुके हैं। ऐसे में क्रॉस वोटिंग व विधायकों की खरीद फरोख्त होने की दशा में भीमराव अंबेडकर का राज्यसभा पहुंचना मुश्किल हो सकता है। हालांकि कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकदल, समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी विधायकों के एकजुट होने की दलील जरूर दे रहे हैं, लेकिन इसका दम अब नामांकन में दिखेगा। वैसे पिछले दिनों प्रदेश में सियासी पारा जिस तरह से बदला है, उसे विपक्ष के लिए कोई बेहतर संकेत नहीं माना जा सकता है।

बीते चार दिनों पर नजर डालें तो, शुरुआत समाजवादी पार्टी व बहुजन समाजपार्टी के साथ होने से हुई। उपचुनाव के लिए दोनों पार्टियों के एक-दूसरे के साथ आने और उसके बाद बहुजन समाज पार्टी के राज्यसभा उम्मीदवार को सपा के वोट दिए जाने की बात सामने आईं। इस समझौते को कांग्रेस के प्रांतीय अध्यक्ष राज बब्बर ने तो अपवित्र करार दे दिया। उनका बयान भले ही कुछ रहा हो, लेकिन आलाकमान ने राज्यसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करने का फैसला कर लिया। मौके की नजाकत और महौल को देखते हुए सियासी दलों ने एक दूसरे से सुर मिलाना तो शुरू कर दिया, लेकिन इन फैसलों से उनके कार्यकर्ता ही पूरी तरह से सहमत नहीं है। मगर यह सियासी मजबूरी बन गया है।

इस पूरे घटनाक्रम में अगला परिवर्तन सोमवार 11 मार्च को देखने को मिला, जब समाजवादी पार्टी नेता नरेश अग्रवाल भाजपा के पाले में पहुंच गए। यही नहीं, भारतीय जनता ने राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नवां उम्मीदवार भी उतार दिया। यानी दस सीटों के लिए 11 प्रत्याशी हो गए। इससे राज्यसभा चुनाव में निर्विरोध निर्वाचन की अटकलें भी थम गईं। यही नहीं, विपक्षी दलों के लिए अपने विधायकों को बचाना भी एक दुश्कर काम दिखाई देने लगा। दरअसल, बसपा प्रत्याशी भीमराव अंबेडकर उसी स्थिति में राज्यसभा पहुंच सकते हैं जबकि उन्हें अब सभी निर्दलीय, कांग्रेस, समाजवादी व बसपा विधायकों के वोट मिले।

नरेश अग्रवाल के पुत्र सहित भाजपा में पहुंचने से यह बात साफ हो चुकी है कि भाजपा ने पहले से ही यह रणनीति तय कर रखी थी और ऐन टाइम पर भाजपा के इस पैंतरे से विपक्षी बैकफुट पर दिखाई दे रहे हैं।

उपचुनाव तय करेंगे एकता की राह

राज्यसभा के लिए दस सीटों पर 11 प्रत्याशियों के आने और विपक्षी वोटों में सेंधमारी पर सीधा असर गोरखपुर व फूलपुर उपचुनाव के परिणाम तय करेंगे। कारण है कि दोनों ही चुनाव में भाजपा विरोधी दल एक होकर चुनाव में हैं। इसके बाद भी भाजपा को बढ़िया विजय हासिल होती है तो विपक्षी दलों से असंतुष्टों का टूटना तय है। यही नहीं, राजनैतिक जोड़तोड़ में महारत रखने वाले नरेश अग्रवाल को इन स्थिति में कामतर नहीं आंका जा सकता है। देखने वाली बात यही होगी कि कौन पार्टी टूट-फूट से बच सकेगी।

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