Irrfan Khan Writes an Emotional Letter About His Health

दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

21 लाख वाहन और 15 कर्मचारी। हिसाब करें तो एक कर्मचारी पर करीब डेढ़ लाख फाइलों का बोझ। उसके साथ ही वाहनों के प्रवर्तन, फिटनेस परमिट के साथ ही लाइसेंस की भी जिम्मेदारी। शायद आपको भी यह चौंका दें लेकिन राजधानी में आरटीओ दफ्तर कुछ इसी तरह से चल रहा है। वाहनों की संख्या के साथ परिवहन साधनों का विकास तो लगातार हुआ लेकिन कर्मचारी घटते चले गए। वैसे इस कमी का प्रत्यक्ष प्रमाण सड़क हादसों में होने वाली मौतों की संख्या है। कारण है कि लाइसेंस जारी करने से लेकर वाहनों को फिटनेस जारी किए जाने तक का काम दलालों के हाथ में पहुंच चुका है। लिहाजा नियम कानून को दरकिनार करने वाले लोगों को भी आसानी से लाइसेंस व परमिट मिल रहे हैं। कर्मचारियों की  यह कमी पिछले दस साल से चल रही है लेकिन इसका शार्टकट कर्मचारियों व अधिकारियों ने हेल्पर के तौर पर निकाल लिया। नतीजा यह हुआ कि कभी किसी अधिकारी ने कर्मचारियों की कमी बात को उठाया ही नहीं। इसका नतीजा यह हुआ कि दफ्तर के काउंटरों पर यह पहचानना भी मुश्किल हो गया कि स्टाफ का कौन है और कौन एजेंट।

बाहरी लोगों के आफिस में सक्रियता का नतीजा यह रहा कि कार्यालय में एजेंटो की घुसपैठ ज्यादा बढ़ गई। यही नहीं, अधिकारी के बदलने के साथ ही एजेंट भी बदलने लगे और कार्यालय भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया। यह सिलसिला दशकों से बदस्तूर जारी भी था लेकिन पिछले दिनों एंटीकरप्शन टीम की छापेमारी के बाद दफ्तर में एजेंटों –हेल्परों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। लिहाजा सारे काम का बोझ कर्मचारियों पर ही आ गया। ऐसे में कर्मचारी भी परेशान होने लगें। लोगों को भी काम कराने के लिए कई कई चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। पिछले दिनों कर्मचारियों व मीडिया कर्मी के बीच मारपीट की घटना में दो कर्मचारियों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज होने पर कर्मचारियों का आक्रोश फूट पड़ा। नतीजा यह है कि अब कर्मचारी हड़ताल पर चले गए हैं। विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि दफ्तर से पिछले दिनों 22 कर्मियों का स्थानांतरण हुआ। उसके सापेक्ष में ज्वाइन करने वाले लोग महज सात थे। उनमें भी दो ज्वाइनिंग देकर अवकाश पर चले गए। लिहाजा दफ्तर में पहले से तैनात करीब 30 कर्मियों की संख्या घटकर महज 14-15 रह गई। उनमें भी चार कर्मी अलग मुकदमों के कारण फरार हैं। इसका सीधा असर दफ्तर के काम काज पर पड़ रहा है। बिना हेल्पर के काउंटर पर तैनात बाबू को ही रिकार्ड तक खंगालना पड़ रहा है लिहाजा पहले जो काम कुछ समय हो जाता था, उसके लिए कई कई दिन लग रहे हैं। खास बात यह है कि इसकी जानकारी मुख्यालय पर भी है लेकिन फिलहाल इस समस्या का समाधान में दूर –दूर तक नहीं दिखाई दे रहा है।

राजधानी में वाहन

 

वर्ष                  वाहनों की संख्या

  • 2005                  749395

  • 2010                  1109774

  • 2103                  1424478

  • 2015                  1709223

  • 2017                  2098440

महज 25 फीसद कर्मचारी

पिछले दिनों हुए तबादलों के बाद आरटीओ दफ्तर में कर्मचारियों की संख्या 2004 में नियत कर्मचारियों के सारेक्ष में महज पचीस फीसद रह गई। यानी 2004 में दफ्तर में 60 लोगों का स्टाफ था जबकि वर्तमान केवल 15-16 ही कर्मी बचे हैं। जबकि वाहनों की संख्या 2004 के मुकाबले में तीन गुणा से अधिक हो चुकी है।

"स्थानांतरण के बाद कर्मचारियों की बहुत कमी है। इस संबंध में मुख्यालय को अवगत भी करा दिया गया है। कर्मचारियों की तैनाती और व्यवस्था मुख्यालय स्तर से की जानी है। इस बावत वहीं से फैसला होगा।"

एके सिंह

आरटीओ

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