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Lucknow | Last Updated : Jan 16, 2018 06:22 PM IST

 

  • हाई निमोनिया-सेफ्ट‍िक शॉक रोगी को मिला नया जीवन              

  • फेफड़े से ह्रदय और फिर रक्‍त में पहुंचा था संक्रमण


New and Valuable Operation Done by KGMU


दि राइजिंग न्‍यूज

आशीष सिंह

लखनऊ।

 

फैजाबाद के रहने वाले मो. उस्‍मान को हाई निमोनिया-सेफ्टि‍क शॉक हुआ तो डॉक्टर्स ने हाथ खड़े कर दिए। परिजन रोगी को लेकर लखनऊ के सिप्‍स अस्‍पताल पहुंचे तो यहां पर भी डॉक्टर्स ने हार मान ली और रोगी को घर ले जाने की सलाह तक दे डाली। नि‍राश उस्‍मान की पत्‍नी निकहत खानम ने अंतिम प्रयास किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) में किया। एक जनवरी को भर्ती हुए उस्‍मान को डॉ. वेद प्रकाश और उनकी टीम ने कार्डियो पल्मोनरी रिससिटैशन (सीपीआर) चिकित्‍सकीय पद्धति के जरिए ना केवल ठीक किया बल्कि मंगलवार को उन्‍हें डिस्‍चार्ज भी कर दिया। उनकी पत्‍नी इस उपचार को चमत्‍कार से कम नहीं मानती। केजीएमयू के रेस्‍पीरेटरी आइसीयू के प्रभारी डॉक्टर वेद प्रकाश ने बताया कि यदि रोगी को समय से उपचार मिल जाए तो ऐसे मरीजों को बचाया जा सकता है। 

हाई निमोनिया-सेप्टिक शॉक-

हाई निमोनिया एक प्रकार का संक्रमण है। हवा में मौजूद बैक्टीरिया और वायरस सांस के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंच जाता है। यदि रोगी पहले से ही फेफड़े या ह्दय की बीमारी से पीड़ित है तो उसे गंभीर संक्रमण अर्थात सीवियर निमोनिया होने की संभावना बनी रहती है। इसी तरह सेप्टिक शॉक भी एक गंभीर समस्या है। इसमें रक्‍तचाप बहुत कम हो जाता है और रोगी की मृत्‍यु तक हो सकती है। रक्‍त में शामिल विषैले विषैले तत्व से शरीर को भारी नुकसान पहुंचता है। संक्रमण के विरुद्ध जो शरीर की प्रति‍क्रिया होती है उसी को सेप्सिस कहते हैं। सेप्सिस के दौरान जब ब्लड प्रेशर बहुत कम हो जाता है तो उसे सेप्टिक शॉक कहते हैं। इसकी इसकी वजह से जान तक चली जाती है। उस्‍मान के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। उन्‍हें भी फेफड़े के द्वारा ह्दय में संक्रमण हुआ। फिर यह ह्दय तक पहुंचा और रक्‍त को संक्रमित करते हुए पूरे शरीर में फैल गया। इससे उस्‍मान के सांस लेने और ह्दय की कार्य क्षमता लगभग समाप्‍त हो चुकी थी।

क्‍या है सीपीआर

जब व्यक्ति का श्‍वसनप्रक्रिया या फिर रक्तप्रवाह रुक जाता है तो उससे मस्तिष्क को हानि पहुंचती है यहां तक की रोगी की मृत्यु तक हो सकती है। सीपीआर (कार्डियो पल्मोनरी रिससिटैशन) के जरिए डॉक्‍टर रोगी को आपातकालीन चिकित्‍सा देते हुए उसका श्‍वसन और रक्‍तप्रवाह बनाए रखते हैं। इसी के साथ ही रोगी का उपचार आईसीयू में रख कर किया जाता है। इस बेहद गंभीर उपचार में किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के रेस्पीरेटरी आईसीयू ने 60 फीसद मरीजों की जिंदगी बचाने में कामयाबी हासिल की है। बीते छह महीने तक यह रिकॉर्ड केवल 40 प्रतिशत तक ही था। आधुनिक तकनीक से हो रहे उपचार के कारण पल्मोनरी मेडिसिन एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग ने आने वाले समय में 80 प्रतिशत मरीजों की जिंदगी बचाने का लक्ष्य रखा है।

सबसे सस्ता आरआइसीयू-

16 मार्च 2017 को केजीएमयू के पल्मोनरी मेडिसिन एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की ओर से ट्रॉमा सेंटर में 16 बेड का आईसीयू खोला गया था। शुरुआती तीन महीने में 135 गंभीर मरीज भर्ती हुए थे। इनमें 60 फीसद की मौत हो गई थी और केवल 40 प्रतिशत  को ही बचाया जा सका। जबकि यूएस में आरआईसीयू में क्योर रेट 80 प्रतिशत है। इस देखते हुए गंभीर मरीजों की मृत्यु दर को कम करने के लिए डॉ। वेद प्रकाश, डॉ। अजय कुमार की टीम ने पेशेंट केयर व ट्रीटमेंट प्रोटोकाल में बदलाव किया। जिससे अधिक मरीजों की जान बच सकी। डॉ। वेद प्रकाश ने बताया कि अगले तीन माह में काफी बेहतर परिणाम आए हैं। जिसमें 60 फीसद मरीजों को बचाया जा सका।

एक्सपर्ट की टीम बचा रही जान

डिपार्टमेंट में फैकल्टी के रूप में डॉ. वेद प्रकाश, डॉ. अजय कुमार पल्मोनरी क्रिटिकल केयर के एक्सपर्ट हैं। इसके अलावा पल्मोनरी क्रिटिकल केयर में डी.एम डॉ. अभिजीत हैं जो दिल्ली के बड़े कॉरपोरेट हॉस्पिटल को छोड़कर यहां आए हैं। टीम में डॉ जयेंद्र, डॉ विपुल, डॉ रोहित,  डॉ अनिल गंगवार शामिल हैं। 10 सीनियर रेजीडेंट, आठ जूनियर रेजीडेंट, सहित अन्य लोग भी सेवा दे रहे हैं। डॉ वेद प्रकाश ने बताया कि आईसीयू में पेशेंट केयर के लिए व‌र्ल्ड लेवल का प्रोटॉकाल लागू किया जा रहा है।

 

केवल हजार रुपये में इलाज-

राजधानी के बड़े-बड़े व्‍यावसायिक अस्‍पतालों के आईसीयू को केजएमयू की यह यूनिट कड़ी टक्‍कर दे रही हैं। इलाज के लिए रोगी से प्रतिदिन केवल एक हजार रुपये ही बेड चार्ज लिया जाता है। लगभग सभी दवाएं संस्‍थाना खुद ही देता है। इससे मरीजों को बेहद सस्‍ते दरों में हाई क्‍लास का उपचार मिलता है।

 

 “उस्‍मान को हाई निमोनिया-सेप्टिक शॉक हुआ था। इससे उनके ह्दय ने काम करना बंद कर दिया था। सीपीआर के जरिए उस्‍मान के ह्दय को फिर से चालू किया गया और उसे ठीक करके घर भेजा गया। इस बीमारी के लिए सबसे महत्‍वपूर्ण होता है कि उसे गोल्‍डन टाइम (कम से कम समय) में चिकित्‍सकीय सुविधा उपलब्‍ध हो जाए। क्‍योंकि यह समय जितना अच्‍छा होगा परिणाम उतने बेहतर आएंगे। निकट भविष्‍य में ऐसे रोगियों को और बेहतर उपचार मिलेगा। इसके लिए केजीएमयू और सरकार लगातार प्रयासरत है।”

डॉ. वेद प्रकाश

केजीएमयू

 



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