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दि राइजिंग न्‍यूज

लखनऊ।

 

नगर निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने तथा लेखा जोखा आनलाइन करने के लिए डबल इंट्री सिस्टम (दोहरी लेखा प्रणाली) आठ साल बाद भी लागू नहीं हो पाई है। जबकि इसे जेएनएनयूआरएम योजना के साथ ही लागू किया जाना था लेकिन हास्यास्पद यह है कि जेएनएनयूआरएम योजना करीब तीन साल पहले बंद हो चुकी है लेकिन लेखा जोखा अभी भी जुटाया जा रहा है। नगर निगम में वित्तीय स्थिति चौपट होती जा रही है।  कर्मचारियों को वेतन व पेंशन तक को लाले हैं मगर जिम्‍मेदार अफसर खर्च को दायें-बांये करने में जुटे हैं। आलम यह है कि कूड़ा प्रबंधन योजना हो या फिर वाहनों की खरीद का, नगर निगम के पास किसी का कोई विवरण नहीं है। अधिकारी इतने मासूम है कि उन्हें ये मालूम है कि कुल कितने वाहन खरीदे गए और क्या कीमत अदा की गई न ही इसकी जानकारी है कि ज्योति इन्वायरों को कितना पैसा फिजूल दिया गया और उसकी रिकवरी की जानी है।    

जानकारों के मुताबिक नगर निगम में जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिनूवल मिशन (जेएनएनयूआरएम) योजना के अन्तर्गत डबल इंट्री सिस्टम रिफार्म का एक पार्ट थी। यह प्रणाली लागू करने के लिए भारत सरकार ने अलग से बजट की व्यवस्था की थी। जिसमें कंप्यूटर खरीद से लेकर कर्मचारियों व अधिकारियों की ट्रेनिंग का खर्च भी शामिल था। केंद्र सरकार द्वारा इस व्यवस्था पर जोर देने का मकदस निगम के आय-व्यय में पारदर्शिता लाना था। लेकिन विभागीय अधिकारियों को आय-व्यय में पादर्शिता रास नहीं आ रही। प्रदेश सरकार की नाक के नीचे संचालित नगर निगम लखनऊ की बात करें तो यहां अभी तक केवल वर्ष 2014 तक का डाटा अपडेट हो पाया है लेकिन ऐसे में सवाल यह उठता है कि यह कार्य जेएनएनयूआरएम योजना के समाप्ती से पहले ही हो जाना चाहिए था। लेकिन वर्ष 2008 से लेकर अब तक 8 साल बीत चुकें है और 2014 में योजना भी समाप्त हो चुकी है। लेकिन सम्‍बन्धित कर्मचारी अपनी कछुआ चाल से ही बढ़ रहे हैं। गले तक भ्रष्टाचार में डूबे निगम अधिकारी भी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। गौरतलब है कि इस सिस्टम के लिए नगर निगम हर महीनें लाखों रूपये वेतन में खर्च करता है। जिसमें से कुछ विभागीय और कुछ कार्यदायी संस्था के लोग हैं। जेएनएनयूआरएम योजना से लेकर उसकी समाप्ती तक दर्जनों बार भारत सरकार की टीमें डबल इंट्री सिस्टम की जांच करने आ चुकीं हैं।

पारदर्शिता से अधिकारियों को परहेज

 

अधिकारियों को सताता है पारदर्शिता का डर- डबल इंट्री सिस्टम अधिकारियों के गले न उतरने का मुख्‍य कारण यह है क्योंकि इस व्यवस्था के लागू होते ही देश में कहीं भी बैठकर नगर निगम की आय-व्यय का लेखा-जोखा ऑनलाइन देखा जा सकता है। चूकिं नगर निगम प्रदेश सरकार के बजट और खुद की आय से करोड़ों बजट विकास कार्यो पर खर्च करता है। बजट कहां खर्च हो रहा है इसके लिए भारत सरकार ने यूपी सरकार के माध्यम से नगर निगम प्रशासन को निर्देश दिए थे कि वह डबल इंट्री सिस्टम लागू करें। सूत्रों के अनुसार प्रदेश सरकार ने केंद्र सरकार को शपथ पत्र दिया दे रखा है। कि नगर निगमों में डबल इंट्री सिस्टम लागू हो चुकी है। जबकि हकीकत कुछ और है।

 

 

"डबल इंट्री सिस्टम के सम्बन्ध में अधिकारियों के साथ कई बार बैठक की जा चुकी है जल्द ही सारा लेखा जोखा अपडेट करने के निर्देश दिए हैं।"

उदयराज सिंह

नगर आयुक्त, नगर निगम

 

"नगर निगम में डबल इंट्री सिस्टम के लिए हम प्रयास कर रहें हैं दस दिनों में  वित्तीय वर्ष 2015-16 की बैलेंस सीट बन जाएगी। 2016-17 में कुछ समय लगेंगा।"

राजेंद्र सिंह,

मुय एंव वित्त लेखाधिकारी,नगर निगम

 

"नगर निगम प्रषासन को पारदर्शिता का भय सताता है इसलिए डबल इंट्री सिस्टम लागू नहीं किया जा रहा है। अगर डबल इंट्री सिस्टम लागू होगा तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा।"

आनंद वर्मा, अध्यक्ष, नगर निगम कर्मचारी संघ

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