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दि राइजिंग न्‍यूज

नई दिल्‍ली।

 

रविवार को आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों की सदस्यता खत्म करने को राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी है। चुनाव आयोग ने इस मामले में बीते शुक्रवार को हुई अहम बैठक में फैसला लेते हुए आप के इन लाभार्थियों की सदस्यता रद्द करने की सिफारिश राष्ट्रपति से की थी। जिसके बाद से आप के 20 विधायकों का भविष्य राष्ट्रपति के दरबार में अटका हुआ था।

इसी मामले में राष्ट्रपति ने निर्णय लेते हुए आयोग की सिफारिश को मंजूरी दे दी। जानिए क्‍या है वो मामला जिसके चलते आप के विधायक अपनी कुर्सी गंवा बैठे-

 

 

गौरतलब है कि दिल्ली में पूर्ण बहुमत में आने के बाद आम आदमी पार्टी सरकार ने अपने 67 में से 21 विधायकों को मार्च 2015 में संसदीय सचिव के पद पर नियुक्त किया था। इस मामले में वकील प्रशांत पटेल ने सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए विधायकों के संसदीय सचिव के पद को “लाभ का पद” बताते हुए राष्ट्रपति से शिकायत की थी।

 

प्रशांत पटेल ने राष्ट्रपति से इस मामले की शिकायत करते हुए सभी 21 विधायकों की सदस्यता रद्द करने की मांग की थी, लेकिन आप के पूर्व विधायक जरनैल सिंह के इस्तीफा देने के बाद ऐसे विधायकों की संख्या 20 रह गई थी, जो आज अपनी सदस्यता गंवा बैठे। शुक्रवार को चुनाव आयोग ने इन 20 विधायकों को अयोग्य घोषित करने की सिफारिश राष्ट्रपति से की थी।

 

 

क्या है "लाभ का पद"?

संविधान के अनुच्छेद 102 (1) A के तहत सांसद या विधायक ऐसे किसी अन्य पद पर नहीं हो सकते जहां वेतन, भत्ते या अन्य दूसरी तरह के फायदे मिलते हों। इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 191 (1) (A) और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 9 (A) के तहत भी सांसदों और विधायकों को अन्य पद लेने से रोकने का प्रावधान है। 

 

 

क्‍या होता है लाभ के पद में?

असल में “लाभ के पद” मामले में संविधान के अनुच्छेद 102(1)(A) के अनुसार अगर कोई सांसद या विधायक किसी भी तरह का लाभ का पद उपयोग करता है तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है। लाभ का यह पद केंद्र या राज्य सरकार किसी के भी अधीन हो सकता है।

 

विशेषज्ञों के अनुसार संविधान के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ऐक्ट 1991 की धारा 15 में भी प्रावधान है कि अगर कोई व्यक्ति विधायक या सांसद के पद पर रहते हुए कोई लाभ का पद धारण करता है तो उसकी सदस्यता जा सकती है। हालांकि पूर्व की सरकारों में भी विधायकों को संसदीय सचिव के पद पर नियुक्त किया जाता था, लेकिन उनकी संख्या दो-तीन से ज्यादा नहीं होती थी। केजरीवाल सरकार ने इस मामले में सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए एक साथ 21 विधायकों को संसदीय सचिव के पद पर नियुक्त कर दिया।

 

 

अब क्या होगा?

आप के 20 विधायकों की सदस्यता खत्म करने को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद अब पार्टी कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे। आम आदमी पार्टी के संयोजक गोपाल राय ने कहा है कि जरूरत पड़े तो वे हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे। हालांकि जानकारों का एक मत यह भी है कि संसदीय सचिव नियुक्त करने संबंधी केजरीवाल के आदेश की वैधानिकता को हाईकोर्ट में पहले ही चुनौती दी जा चुकी है।

अदालत इस मामले को उपराज्यपाल एवं मुख्यमंत्री के अधिकारक्षेत्र से संबंधित याचिका के साथ मिलाकर सुनवाई कर रही है। इसलिए हाईकोर्ट का फैसला आने तक निर्वाचन आयोग कोई सिफारिश नहीं करेगा।

 

दिल्ली में 1997 में सिर्फ दो पद (महिला आयोग और खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष) ही लाभ के पद से बाहर थे। 2006 में नौ पद इस श्रेणी में रखे गए, पहली बार मुख्यमंत्री के संसदीय सचिव पद को भी शामिल किया गया था। दिल्ली सरकार मौजूदा कानून में संशोधन कर "मुख्यमंत्री और मंत्रियों के संसदीय सचिव" शब्द को शामिल करना चाहती है।

 

 

20 के बाद केजरीवाल के इन 27 विधायकों पर भी लटकी है तलवार

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही है। 20 के बाद अभी आप के 27 और विधायकों पर भी अयोग्यता की तलवार लटकी हुई है, और अगर ऐसा होता है तो केजरीवाल की सरकार भी खतरे में पड़ सकती है।

दरअसल, चुनाव आयोग में अस्पतालों में “रोगी कल्याण समिति” के अध्यक्ष के तौर पर विधायकों को नियुक्त किए जाने का एक मामला अभी भी लंबित है। इसमें 10 संसदीय सचिवों समेत 27 विधायक शामिल हैं। हालांकि पार्टी का कहना है कि सभी नियुक्ति नियमों के अनुसार की गईं हैं।

 

 

पहले की सरकारों की तरह अस्पतालों की कमेटियों में विधायकों को रखा गया है, लेकिन इसे लाभ का पद बताते हुए विभोर आनंद नामक एक वकील ने 2016 में आयोग में शिकायत की थी। मामला तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास पहुंचा था।

राष्ट्रपति ने इसे जांच-पड़ताल के लिए चुनाव आयोग के पास भेज दिया था। अभी इस मामले में फैसला आना बाकी है। अगर इस मामले में आयोग आप विधायकों के खिलाफ फैसला देता है तो विधानसभा में पार्टी को सरकार बनाने के लिए मुश्किलें आ सकती हैं। आरोप है कि आप सरकार ने नियमों के खिलाफ जाकर विधायकों को अध्यक्ष के पद पर आसीन कर दिया।

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