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दि राइजिंग न्यूज़

लखनऊ।

 

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश प्राविधिक विश्विवद्यालय का नाम पूर्व राष्ट्रपति के नाम पर डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय रखा था। मंशा थी डॉ.कलाम के सम्मान से विवि के मान को बढ़ाना। अखिलेश यादव की इस नेक इच्छा पर एकेटीयू के वर्तमान कुलपति विनय कुमार पाठक बट्टा लगा रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि इनके कुलपति बनने के बाद से विवि से संबद्ध प्रदेश के इंजीनियरिंग संस्थानों में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या लगातार घट रही है। वहीं कुलपति पर इसका कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा। स्थिति बेहतर करने की बजाय वह तो भ्रष्टाचार करने, अपने चहेतों को कोटा से लखनऊ में नियुक्ति दिलाने और एकेटीयू के घूसखोर कर्मचारियों को मलाई वाले पद देने में व्यस्त हैं। यही नहीं विवि को गर्त में पहुंचाकर वह इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति बनने के लिए ऐढ़ी चोटी का जोर लगाए हुए हैं।

 

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यूपीएसईई में करोड़ों की लग रही चपत

प्रदेश के इंजीनियरिंग संस्थानों में प्रवेश के लिए एकेटीयू उत्तर प्रदेश राज्य प्रवेश परीक्षा (यूपीएसईई) का आयोजन करता है। पूर्व कुलपति प्रो.आरके खांडल के समय में यूपीएसईई के जरिए प्रवेश लेने वाले अभ्यर्थियों की संख्या 40 हजार तक पहुंच गई थी। विनय पाठक के आने के बाद यह संख्या लगभग आधी रह गई है, जबकि फार्म भरने वाले अभ्यर्थियों की संख्या पिछले दो सत्रों में क्रमशः 163553 व 144239 रही है। यूपीएसईई के आयोजन में विवि करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाता आ रहा है। विद्यार्थियों की घटती संख्या से करोड़ों रुपये डूबते ही नजर आ रहे हैं।

 

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खतरे में इंजीनियरिंग की पढ़ाई और कॉलेज

वर्तमान में प्रदेश के इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कॉलेजों की स्थिति बेहद खराब है। हालत यह है कि वर्तमान सत्र में बी.टेक, एमबीए समेत अन्य कोर्सेज की करीब 1.46 लाख सीट हैं। लेकिन, इस सत्र में सिर्फ 72-73 हजार पर ही दाखिले हुए। तकरीबन 50 प्रतिशत के आसपास सीट खाली रह गई हैं।नतीजतन कालेज बंद रहे हैं और एकेटीयू में लूट की होड़ लगी है।

चहेतों को रेवड़ियां बांटने में मशगूल विनय पाठक

साल 2015 में विनय पाठक ने कुलपति पद की कमान संभाली। इसी के बाद से एकेटीयू में लगभग ग्रहण सा लग गया। घोटाले तो हुए साथ-साथ विवि की गरिमा भी प्रभावित हुई है। विनय पाठक का सारा ध्यान चहेतों को रेवड़ियां बांटने में रहता है। कैसे अपने चहेतों को कुर्सियां परोसी जाएं, कैसे चारों ओर अपने आदमी फैलाए जाएं और कैसे अपना काम बनाया जाए, इसी पर इनकी दिनचर्या टिकी रहती है।

 

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कोटा के बाद एकेटीयू, लिखित परीक्षा का खेल

अभी हाल ही में एकेटीयू कुलपति विनय कुमार पाठक पर आरोप लगा है कि इन्होंने 7000 अभ्यर्थियों की जिंदगी मजाक बना दी। दरअसल, विवि से एफिलिएटेड कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर नियुक्तियां निकलीं। कुलपति जी ने इस पर धांधलियां कर डाली और हेरफेर कर पदों पर अपने आदमियों को बैठा दिया, आवेदकों का आक्रोश फूटा और उन्होंने इस मुद्दे पर कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। यह पहला मौका नहीं है जब पारदर्शिता दिखाने के लिए लिखित परीक्षा कराई गई हो और बाद में आरोप न लगे हों। कोटा में भी इसी साजिश के तहत ही  लिखित परीक्षा के माध्यम से ही अपनों की नियुक्ति का खेल बखूबी अंजाम दिया जा चुका है। इसकी शिकायत भी बड़े स्तर पर की गई है।

घूसखोर घोटालेबाजों को महत्वपूर्ण पद

एकेटीयूके छात्रों का भविष्य ग्रहण से ढंका हुआ साफ नज़र आ रहा है। विनय पाठक ने AKTU की बागडोर उन हाथों में सौंप दी है जिनके कारनामे काफी नामचीन हैं।हाल ही में विश्वविद्यालय के अधिकारी से मारपीट के मामले में विवि के जिस कर्मचारी पर एफआइआर दर्ज कराई जा चुकी है, उसी सहायक कुलसचिव आरके सिंह को राज्य प्रवेश परीक्षा का उप समन्वयक बनाया गया है। पूर्व कुलपति प्रो.आरके खांडल के कार्यकाल में आरके सिंह पीएचडी का कार्यकाल संभालता था। उस समय गौतम बुद्ध नगर के समाजवादी पार्टी के विधायक से एक महिला ने आरके सिंह द्वारा 50 हजार रुपये लेने की शिकायत की थी। विधायक और महिला ने साक्ष्यों के साथ कुलपति प्रो.खांडल से शिकायत की थी। लखनऊ विवि के एक रिटायर शिक्षक ने भी अपनी बेटी से घूस मांगने का आरोप आरके सिंह पर लगाया था। ये शिकायतें सही साबित होने पर आरके सिंह से पीएचडी का कामकाज छीन लिया गया था। यही नहीं जिस शख्स ने किताबों की छपाई के टेंडर में पांच करोड़ का घोटाला किया और एफआइआर दर्ज हुई उस अभिषेक नागर को आइईटी में सिस्टम मैनेजर नियुक्त कर दिया गया।

 

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श्रेय लेने में माहिर है पाठक

कुलपति विनय पाठक श्रेय लेने और वाहवाही लूटने में सबसे आगे हैं। एकेटीयू की नवनिर्मित बिल्डिंग का काम पूर्व कुलपति प्रो. कृपाशंकर के कार्यकाल में 85 फीसद तक पूरा हो चुका था। विनय पाठक के कार्यकाल में सिर्फ इसे पूरा किया गया है लेकिन कुलपति श्रेय लेने से नहीं चूकते कि बिल्डिंग का कार्य उन्होंने कराया है। यही नहीं कर्मचारियों के विनियमितीकरण की प्रक्रिया भी पूर्व कुलपति डॉ.आरके खांडल के प्रयासों से पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पत्र से हुई थी, इसमें भी पाठक अपनी ही पीठ थपथपाते हैं।

विनियमितीकरण करने में भी हेरफेर का आरोप

विनय पाठक के गड़बड़ घोटाले एक नहीं बल्कि कई हैं। इनपर अपने चहेतों को नौकरी बांटने के साथ-साथ इनका विनियमितीकरण करने का भी आरोप लगा है। हालांकि इसकी जांच शासन द्वारा चल रही है। गौरतलब है कि कुलपति जी ने अपने दाहिने और बाएं हाथ कह जाने वाले आरके सिंह और अशीष मिश्र का विनियमितीकरण करवा दिया। मतलब ये कि, जिस पद के लायक ये थे भी नहीं उस पद पर इनकी नौकरी पक्की हो गयी।

 

ऊंचे पदों पर है कुलपति की निगाह

विनय पाठक अपने लोगों को हर ऊंचे ओहदे का मलाई खिलाने की कूटनीति रचते हैं। इसमें उनका प्रमुख हथियार साबित हो रहे हैं आइआइटी कानपुर के पूर्व निदेशक संजय गोविंद धांडे। एकेटीयू, इग्नू, और एचबीटीयू की कुलपति चयन में धांडे की भूमिका अहम है। एकेटीयू में धांडे विनय पाठक के नाम पर मुहर लगा भी चुके हैं। इग्नू में भी विनय पाठक की दावेदारी है, वहीं एचबीटीयू में आइईटी के एक शिक्षक की नियुक्ति कराने में पाठक लगे हैं। एकेटीयू के संबद्ध इंजीनियरिंग कॉलेजों में निदेशक की नियुक्ति में भी पाठक इसी हथियार का इस्तेमाल कर रहे हैं।

 

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“एडमिशन कम होने की बात सही है लेकिन मेरा इस पर कुछ कहना ठीक नहीं है”

आशीष मिश्र

जनसंपर्क अधिकारी एकेटीयू 

 

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