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दि राइजिंग न्‍यूज

कानपुर।

 

हमारे देश में आस्था के अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं। कानपुर शहर के बीचों-बीच बने प्रख्यात जंगली देवी मंदिर पर आज के आधुनिक युग में भी लोगों की आस्था बरकरार है। इस मंदिर का निर्माण राजा भोज के कार्यकाल में किया गया था।  

 

 

ईंट रखकर मांगते हैं मुराद

कानपुर के किदवई नगर चौराहे के निकट बने प्राचीन जंगली देवी मंदिर में यूं तो हमेशा भक्तों का तांता लगा रहता है लेकिन नवरात्रि में खास तौर पर दूर-दूर से श्रद्धालु माता की भक्ति में खिंचे चले आते हैं। इस मंदिर की मान्यता यह है कि यहां पर जो भी भक्त ईंट रखकर अपनी मुराद की अर्जी लगाता है, उसकी अर्जी मां कबूल कर उसे धन्य-धान्य से फलीभूत करती हैं। वहीं, मुराद पूरी होने के बाद भक्त अपनी ईंट को घर पर स्थापित करता है।

 

 

कानपुर से रिपोर्टर विशाल शुक्ला की एक रिपोर्ट

इस मन्दिर के कर्ताधर्ता व प्रबंधक डी पी बाजपेई की माने तो 17 मार्च 1925 को यहां से कुछ दूरी पर बाकरगंज में मो. बकर के घर खुदाई के दौरान एक ताम्रपत्र मिला था, जिस पर विक्रम संवत 893 अंकित था। पुरातत्व विभाग ने उसे लखनऊ संग्राहलय भेज दिया। जानकारों की माने तो यह मन्दिर राजा भोज के समय का लगभग 1400 साल पुराना है, उस वक्त यहां घनघोर जंगल और तालाब हुआ करता था।

 

 

...तभी से नाम पड़ गया जंगली देवी मंदिर

उन्‍होंने बताया कि ऐसा हमारे बुजुर्ग बताते थे कि यहां एक नीम का पेड़ था उस वृक्ष के खोह में वहीं पर यह मैया विराजमान थीं। यहां साधु-संत तपस्या करते थे। उस समय घने जंगल और जंगली जानवरों की वजह से यहां लोग जाने में डरते थे तभी से इस म‍ंदिर का नाम जंगली देवी मंदिर पड़ गया। 1979 में यहां नीम का वृक्ष गिरा और यहां के श्रद्धालु भक्त ने इसका निर्माण किया और तबसे यह ट्रस्ट कार्य कर रहा है।

 

 

इस मंदिर में इतने भक्त पत्थर लगाने आते हैं कि हमारे पास जगह नहीं बचती कि पत्थर लगा सकें। ईंट की ऐसी मान्यता है कि यहां भक्त जो मकान बनवाते हैं, उसकी पहली ईंट यहां रखते हैं। भक्तों का ऐसा मानना है कि ऐसा करने से हमारा भवन का निर्माण सकुशल और बड़े पैमाने पर होता है। यहां पर मैया तीन रूप बदलती हैं। श्रद्धा भाव से मैया को देखिए वह आपको तीन रूपों में दिखाई देंगी।

ऐसा मानना है कि मैया यदि भक्तों को वह तीन रूप बदलते हुए संकेत दें तो इसका अर्थ यह है कि उसकी मनोकामना पूरी होने वाली है। उन्होंने बताया कि यह प्रतिमा स्थापित नहीं की गई बल्कि बहुत प्राचीन है। उन्‍होंने बताया कि सीता मैया जब बिठूर में थी तब यहां वे लव-कुश को लेकर आती थीं। यहां भक्‍त देश के कोने-कोने से माता के दर्शन के लिए आते हैं और माता उनकी मनोकामना जरूर पूरी करती हैं। यहां बराबर अखंड ज्योति जल रही है।

माता की कृपा है हम पर

माता के दर्शन के लिए आई नीलम शुक्ला ने बताया कि हमारे पति को पैरालिसिस था, वह माता की कृपा से एक दम ठीक हो गए। मंदिर के सदस्य रमेश तिवारी ने बताया कि बचपन से मां के साथ यहां आ रहे हैं। मंदिर की ऐसी मान्‍यता है कि इस मंदिर में लड़का-लड़की को शादी के लिए दिखाया जाता है, जिससे माता उनकी मनोकामना जरूर पूरी करती हैं।

 

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