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दि राइजिंग न्‍यूज

कानपुर।

 

बाबा शिव के पवित्र त्योहार सावन मास के दूसरे सोमवार में शिवालयों में भक्तों की अपार भीड़ सुबह से ही उमड़ना शुरू हो गयी। हर तरफ भक्त झूमते-गाते हर हर महादेव, बम बम भोले के जयकारे लगा रहे हैं। एक तरफ मंदिर के उस पार गंगा मैया अठखेलियां खेल रही हैं और दूसरी तरफ इस सावन में भक्त गंगा में डुबकी लगाकर भोलेनाथ के दर्शन कर रहे हैं। प्रशासन की कड़ी सुरक्षा के बीच भक्त शिवालयों में दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं।

 

 

जाजमऊ स्थित सिद्धनाथ मन्दिर में भी भक्तों की भीड़ सुबह से ही भोलेनाथ के जयकारे लगाते हुए उमड़ पड़ी। सुबह मंदिर के पट खुलते ही भक्तों ने सिद्धनाथ बाबा के दर्शन किए। भक्तों ने शिवलिंग पर दूध, दही, बेलपत्र और जलाभिषेक कर मनोकामनाएं मांगी।

 

 

ऐसे बना यह दूसरा काशी

चकेरी क्षेत्र का जाजमऊ चमड़े के लिए प्रसिद्ध है। इसी क्षेत्र में बाबा सिद्धनाथ का दरबार है। यह मुस्लिम बाहुल्य इलाका है। यहां लोगों का ऐसा मानना है कि बाबा सिद्धनाथ सभी पर कृपा बरसाते हैं। चाहे वह हिन्दू हो या मुस्लिम। हर दिन यहां लोग बाबा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं और मनोकामना मांगते हैं।

बात की जाए सिद्धनाथ मंदिर के इतिहास की तो यहां ऐसा कहा जाता है कि इस मन्दिर का इतिहास अनादिकाल से चला आ रहा है। उस वक्त यह जगह राजा ययाति के द्वारा बसाई गयी थी, लेकिन ऐसी मान्यता है कि उस समय जाजमऊ स्थित राजा ययाति का महल हुआ गंगा के किनारे से सटा हुआ करता था। उस दौरान जंगल में एक गाय श्यामा गौ हुआ करती थी। खास बात यह थी कि उस गाय के पांच थन थे। चरवाहे उस गाय को सुबह अन्य गायों के साथ जंगल में चरने के लिए छोड़ दिया करते थे।

 

 

राजा ने की शिवलिंग की स्‍थापना

इस दौरान जैसे ही शाम होती थी सभी गाय अपने ठिकाने पहुंच जाती थीं, जबकि वह गाय अक्सर झाड़ियों के पास जाकर अपना दूध एक पत्थर पर गिरा देती थी। जब ये बात राजा को पता चली तब उन्होंने अपने रक्षकों से इस बारे में जानकारी करने को कहा। राजा के रक्षकों ने बताया कि गाय झाड़ियों के पास अपना दूध एक पत्थर पर गिरा देती है। उसी वक्त राजा ने फैसला किया कि हम वहां चलेंगे। उस जगह पर जाने के बाद उन्होंने उस टीले के आसपास खुदाई करवाई जहां उन्हें खुदाई करते वक्त एक शिवलिंग दिखाई दिया। जिसके बाद राजा ने विधि-विधान से शिवलिंग का पूजन कर शिवलिंग को स्थापित कर दिया।

इसलिए कही जाने लगी दूसरी काशी

कहा जाता है कि राजा को एक रात स्वप्न आया कि यहां 100 यज्ञ पूरे करो तो यह जगह काशी कहलाएगी। जिसके बाद राजा ने विधि-विधान से यज्ञ प्रारंभ कर दिया। बताया जाता है कि राजा के 99 यज्ञ पूरे हो गए थे और 100वें यज्ञ के दौरान इंद्र ने कौवे का रूप धारण कर उस हवन कुंड में हड्डी डाल दी, जिसके बाद ये जगह काशी बनने से तो चूक गयी, लेकिन आज भी सभी भक्त इसे द्वितीय काशी के रूप में जानते हैं। तबसे लेकर ये प्रसिद्ध मंदिर सिद्धनाथ बाबा के नाम से जाना जाने लगा।

दरबार से कोई नहीं लौटता खाली हाथ

वहीं, अपने बुजुर्गों के समय से आ रहे भक्त राजकुमार ने बताया कि बचपन से अपने दादा और पिता के साथ लगातार बाबा के दरबार आ रहे हैं। बाबा ने कभी निराश नहीं किया। भक्त सुशील कुमार भी बाबा के दरबार पहुंचे, जहां उनका कहना है कि बाबा की बड़ी दया है। वहीं, सुरेंद्र, चंद्रकला बालकराम और महिमा ने बताया कि यहां बाबा सिद्धनाथ के दरबार जो भी आया खाली हाथ नहीं लौटा। ये बहुत ही सच्चा दरबार है। सच्चे मन से जो भी भक्त महादेव के दर्शन को पहुंचता है, भोलेनाथ उसकी मनोकामना पूरी जरूर करते हैं।

 

 

 

सावन के चौथे सोमवार को लगता है भव्य मेला

सिद्धनाथ मंदिर के पुजारी मुन्नी लाल पांडेय ने बताया कि सिद्धनाथ मंदिर में श्रद्धालुओं की प्रत्येक दिन भीड़ बनी रहती है। देश-प्रदेश के कोने-कोने से लोग भोलेनाथ के दर्शन के लिए यहां आते हैं। यहां सावन के चौथे सोमवार के दिन भव्य मेले का भी आयोजन होता है। भक्तों को सिद्धनाथ बाबा ने कभी निराश नहीं किया। बच्चों का मुंडन हो या किसी भी प्रकार की मनोकामना बाबा सिद्धनाथ जरूर उसे पूरा करते हैं। संतान प्राप्ति के लिए लोग पूजा अर्चना करते हैं, उनकी मुराद बाबा अवश्‍य पूरी करते हैं।

 

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