Neha Kakkar First Time Respond On Question Of Ex Boyfriend Himansh Kohli

दि राइजिंग न्‍यूज

विशाल शुक्‍ला

कानपुर। 

 

पहले देसी अखाड़े की पहलवानी की बात ही निराली थी, लेकिन जबसे इंग्लिश जिम आ गए हैं तबसे अखाड़ों में भीड़ कम होने लगी है। अब इन अखाड़ों को न ही कोई पूछ रहा है और न ही इसकी तरफ कोई ध्यान दे रहा है। एक वक्त था जब शहर में लगभग 64 अखाड़े हुआ करते थे, वहीं अब गिनती के महज़ दो या तीन ही अखाड़े बचे हैं, जो चल तो रहे हैं। मगर, उसमें पहलवानों की भीड़ कम हो गयी है। शायद लोगों को जल्दी बॉडी बनाने का शौक चढ़ गया है।

 

 

ज्‍यादा दिनों तक टिकती नहीं इंग्लिश जिम से बनी बॉडी

आज लोग दारा सिंह नहीं बल्कि सलमान खान और रितिक जैसी बॉडी बनाने की होड़ में लगे हुए हैं, इसलिए देसी पहलवानी की तरफ लोगों का झुकाव कम हुआ है। एक वक्त था जब अखाड़ों की पहलवानी व कुश्ती में ज्यादा से ज्यादा लोग हिस्सा लेते थे और दूर-दूर से लोग ये देसी रेसलिंग देखने आते थे। मंगर, आज वक्त बदलने के साथ ही लोग भी बदल गए और इन अखाड़ों की अहमियत को भूल गए।

जबकि एक बात साफ है कि इंग्लिश जिम में बॉडी जल्दी तो बन सकती है, लेकिन ज्यादा दिन टिक नहीं सकती। वहीं, देसी कुश्ती में बॉडी लोहा बनकर उभरती है, ऐसा कहना है देसी पहलवानों का।

 

 

अब तो रह गया केवल नाम का अखाड़ा

अंग्रेजों के समय से चला आ रहा ये भगवतदास घाट का अखाड़ा शहर का सबसे पुराना और चर्चित अखाड़ा रहा है। यहां कुश्ती पहलवानी के लिए लोग कई जिलों से आते हैं और दंगल के दांव पेंच सीखते हैं। इस अखाड़े में लगभग 150 पहलवान आज भी हैं। इस अखाड़े ने हज़ारों से ज्यादा की संख्या में बड़े-बड़े पहलवान दिए हैं, जोकि कई बड़े नेशनल स्तर पर पहलवानी में अपना लोहा मनवा चुके हैं। अखाड़े के प्रबंधक दिनेश पहलवान खुद भी नेशनल स्तर पर कुश्ती कर चुके हैं और उनके पिता चंदू पहलवान, जिन्हें महाबली की भी उपाधि दी जा चुकी है उनके सिखाए हुए चेले आज कोई एयरफोर्स में है तो कोई आर्मी में।

 

 

उस समय अखाड़े का सही मतलब समझ आता था, आज तो केवल नाम के लिए अखाड़ा रह गया है।

 

 

सुल्तान-दंगल मूवी के बाद जागी थी किरण

दिनेश पहलवान ने बताया कि अखाड़े की व्यवस्था खुद देखनी पड़ती है। यह पुराना अखाड़ा है। यहां पहलवानों के रुकने की भी व्यवस्था है। इस अखाड़े में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कमलापति त्रिपाठी रेल मंत्री तक आ चुके हैं। आज ये अखाड़ा चल तो रहा है, लेकिन पहले की अपेक्षा अब लोगों में कुश्ती को लेकर वो उत्साह नहीं दिख रहा है। जब सुल्तान और दंगल मूवी आयी थीं, तब एक बार ऐसा लगा था कि शायद फिर से अखाड़ों को रोशनी मिल जाएगी, लेकिन फिल्में उतरी तो पहलवानी भी उतर गई। अखाड़ों की संस्कृति विलुप्त हो चुकी है।

उन्‍होंने कहा, आज के जो गार्जियन हैं वो अपने बच्चों को अखाड़े नहीं भेजना चाहते, जबकि पहले गार्जियन खुद तो अखाड़े में व्यायाम करते ही थे और साथ में अपने बच्चों को भी अखाड़े में लेकर आते थे। देसी कसरत जिंदगी भर साथ देती है, जबकि इंग्लिश में पानी पिलाकर बॉडी बनाई जा रही है। जिससे मरीज़ बढ़ गए हैं, क्योंकि इंग्लिश की खराबी है कि जब आप कसरत छोड़ दो आप के अंदर कई बीमारियां जन्म ले लेती हैं। नागपंचमी के दिन बड़े स्तर पर कुश्ती की प्रतियोगिता हर साल आयोजित की जाती है, जिसमें प्रदेश स्तर के पहलवान शिरकत करते हैं।

 

 

हम में भी है देश का नाम रोशन करने की क्षमता

वहीं, पिछले 20 सालों से लगातार इस अखाड़े में कुश्ती कर रहे कपिल ने बताया कि मैं खुद एक प्राइवेट जॉब करता हूं। आज अखाड़ों की जो स्थिति है, वह किसी से छिपी नहीं है। सरकार जैसे क्रिकेट और अन्य खेलों पर ध्यान दे रही है, वैसे इन अखाड़ों और पहलवानों पर ध्यान नहीं दे रही। आज जो सक्षम हैं वो आगे हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए। हम भी अच्छा और देश का नाम रोशन कर सकते हैं। सरकार अगर अखाड़ों की स्थिति को सुधारे तो यहां से भी कई होनहार पहलवान आगे बढ़कर देश का नाम रोशन कर सकते हैं।

 

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