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गंगा को बचाने के लिए शुरू की अनोखी मुहिम

Kanpur | Last Updated : May 10, 2018 08:45 PM IST

Biodiversity Conservation and Ganga Rejuvenation Press Conference in Kanpur


दि राइजिंग न्‍यूज

कानपुर।

 

बुधवार को जैव विविधता संरक्षण एवं गंगा जीर्णोद्धार द्वारा एक प्रेसवार्ता कार्यक्रम का आयोजन किया। यह संस्‍था नमामि गंगे योजना द्वारा राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन और भारतीय वन्य जीवन संस्थान के तत्वाधान में गंगा को नई पहचान दिलाने का काम कर रही है। संस्था गंगा में पाए जाने वाले असंख्य जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की देखभाल करने का काम करती है।

तथ्यों के अनुसार आपको बता दें कि गंगा में वनस्पतियों एवं जंतुओं की 25 हजार प्रजातियां मौजूद हैं। इसमें घड़ियाल, बड़े-छोटे मगरमच्छ और मीठे पानी में रहने वाले कछुए की 12 जातियां और केकड़ों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं। साथ ही गंगा नदी में भी मछलियों की 143 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिसमें गंगा शार्क, गंगा स्टिंगरे और हिलसा प्रमुख हैं। इन सभी जीव-जंतुओं को स्वच्छ वातावरण और गंगा में उपस्थित तमाम तरह की गंदगियों से बचाने का काम यह संस्था कर रही है।

ये है मिशन का उद्देश्‍य

इस मिशन के बारे में जानकारी देते हुए डॉक्टर रुचि बडोला ने बताया कि राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के सहयोग से जलचर संरक्षण को बचाने का काम कर रही है। हमारी संस्था ने एक सर्वे निकाला है कि इस तरह के जीव-जंतु कहां पाए जाते हैं और वहां पर हमारी संस्था बचाव एवं प्रजनन केंद्र स्थापित कर रही है। ताकि जो वन्य जीव-जंतु जो कि गंगा किनारे किसी भी आपदा में पहुंच जाते हैं या गांव के लोग पकड़ लेते हैं उनसे वापस लेकर उन जीव-जंतुओं की रक्षा कर सकें, उन्हें दोबारा वापस गंगा में भेज सकें।

गंगा को बचाने के लिए सहभागिता की जरूरत है

उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश में जलचर संरक्षण का कार्य दो जगह पूरा हो चुका है, जो कि नरोरा और वाराणसी में है। जहां गंगा प्रहरी बनाकर गांव के लोगों को जागरूक किया जा रहा है और उन्हें जीव-जंतु को बचाने की ट्रेनिंग दी जा रही है। साथ ही उन्होंने अपील करते हुए कहा कि गंगा को बचाने में हमें सहभागिता की ज़रूरत है जो स्थानीय समुदाय द्वारा ही मिल पाएगी।

हमारी संस्था ने निवेदन किया है कि गंगा किनारे रहने वाले लोग प्रहरी के रूप में जीव-जंतु की रक्षा करें, क्योंकि गंगा की स्वच्छता व निर्मलता का कारक डॉल्फिन, मगरमछ और मछलियां ही उसका प्रतीक हैं। वहीं डॉक्टर एस ए हुसैन ने बताया कि आज भी हमारी गंगा में डॉल्फिन, घड़ियाल और मगरमच्छ बचे हुए हैं। जहां जलप्रभाव अच्छा है, वहां हमारा फोकस है कि इन जीवों की मदद से जैव विविधता को कैसे वापस लाया जा सके।

यह है संस्‍था का लक्ष्‍य

यह संस्था स्थानीय समुदायों को शिक्षित करने के लिए चुनिंदा जगहों पर केंद्र खोलकर जैव विविधता के बारे में जानकारी भी दे रही है। इनका लक्ष्य यह है कि कानपुर के गंगा नदी के किनारे भी जलीय जीवों की विज्ञान आधारित पुनः स्थापना को बढ़ावा दिया जाए। ताकि संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए बचाव एवं पुनर्वास केंद्रों की स्थापना हो सके।



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