Complaint Filed Against Aditya Pancholi At Versova Police Station

दि रा‍इजिंग न्‍यूज

कानपुर।

 

मंगलवार को भारतीय दलित पैंथर एवं अन्य सामाजिक संगठनों द्वारा परेड स्थित शिक्षक पार्क में भीमा कोरेगांव की 201वीं जयंती को शौर्य दिवस के रूप में मनाते हुए विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया।

महारो दलितों के शौर्य का प्रतीक

इस विचार गोष्ठी का मकसद था कि भीमा कोरेगांव की 201वीं जयंती को शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाए। जहां दलित पैंथर व अन्य सामाजिक संगठनों ने एकजुट होकर कैंडल जलाकर उनके स्‍तंभ पर उन्हें याद किया। विचार गोष्ठी को संबोधित करते हुए अध्यक्ष पैंथर धनीराम बौद्ध ने बताया कि 1 जनवरी 1818 को भीमा कोरेगांव में अंग्रेजों की सेना में पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28 हज़ार सैनिकों को हराया था। ब्रिटिश सेना में अधिकतर महार अनु जाति समुदाय के जवान थे।

उन्‍होंने कहा, इतिहासकारों के मुताबिक, महारों की संख्या लगभग 500 थी, इसलिए दलित समुदाय इस युद्ध को ब्राह्मणवादी सत्ता के खिलाफ जंग मानता है। तबसे प्रत्येक वर्ष 1 जनवरी को दलित नेता ब्रिटिश सेना की इस जीत का जश्न मनाते आ रहे हैं। साथ ही यह भीमा कोरेगांव युद्ध जो बाजीराव द्वितीय और अंग्रेजों के बीच लड़ा गया व अंग्रेजों की विजय के साथ महारो दलितों के शौर्य का प्रतीक है। बाबा साहेब जब तक जीवित रहे वह प्रत्येक वर्ष एक जनवरी को कोरेगांव जाते थे और महारो के इस विजय को शौर्य दिवस के रुप में मनाते थे। जब-जब दलितों को मौका मिला, तब-तब दलितों ने अपनी कलम व तलवारों से विजय गाथा लिखकर अपना परचम लहराया।

 

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