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“भस्मासुरों” से काम ले पाना आसान नहीं

Guest Column | 28-Jul-2016 06:58:44 PM
     
  
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श्याम कुमार           

केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार ने एक ऐसा साहसिक एवं क्रांतिकारी निर्णय किया है, जो देश की तकदीर बदल सकता है। उससे देश की चाल सुस्त से चुस्त हो सकती है तथा जनता को यातनाओं की चक्की में पिसने से मुक्ति मिल सकती है। केंद्र सरकार ने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू कर दी हैं तथा इस आशय की अधिसूचना जारी कर दी गई है। इसी जुलाई से आदेश कार्यान्वित हो जाएगा। इससे केंद्र सरकार के लगभग 99 लाख कर्मचारियों व पेंशनधारकों को लाभ मिलेगा। अब केंद्रीय कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन 18 हजार रुपये हो जाएगा। एक जनवरी, 2016 से लागू किए गए इस वेतनमान से मूल वेतन में 2.57 गुना बढ़ोतरी हो जाएगी। अब वेतन-वृद्धि एक जनवरी एवं एक जुलाई को हुआ करेगी। कर्मचारियों को इनमें से किसी एक तिथि में साल में एक बार वेतन-वृद्धि प्राप्त होगी, जो उनकी नियुक्ति एवं पदोन्नति के आधार पर तय होगी। पहले सिर्फ एक जुलाई को ही वेतन-वृद्धि हुआ करती थी। केंद्र में कैबिनेट सचिव का वेतन 90 हजार से बढ़कर ढाई लाख रुपये हो जाएगा। विभिन्न आयोगों के अध्यक्षों को वेतन-वृद्धि का सर्वाधिक लाभ होगा। दूरसंचार नियामक प्राधिकरण, विद्युत नियामक प्राधिकरण आदि के अध्यक्षों का मासिक वेतन साढ़े चार लाख रुपये व सदस्यों का वेतन चार लाख रुपये हो जाएगा। केंद्रीय कर्मचारियों के बढ़े वेतन पर महंगाई भत्ते को छोड़कर भत्तों के निर्धारण हेतु वित्त सचिव की अध्यक्षता में समिति बनाई गई है, जो चार महीने में रिपोर्ट देगी। तब तक वर्तमान भत्ते मिलते रहेंगे।


इस वेतन-वृद्धि से सरकारी खजाने पर 1.02 लाख करोड़ रुपये का वार्षिक बोझ बढ़ेगा। जाहिर है कि अंततः यह बोझ टैक्सों के रूप में आम जनता से वसूला जाएगा। केंद्रीय सेवा में कर्मचारियों की संख्या 46 लाख एवं पेंशनधारकों की संख्या लगभग 53 लाख है। अब तक यह व्यवस्था थी कि बहुत से ऐसे कर्मचारी होते हैं, जिन्हें किसी कारणवश पदोन्नति का लाभ नहीं मिल पाता था तो भी अगले पद का वेतनमान उन्हें मिल जाया करता था। यह वेतनमान क्रमश: दस,  बीस तथा तीस वर्ष के सेवा-काल में मिलता था। अब इस व्यवस्था का आधार कार्य-निष्‍पादन का नया मानक बना दिया गया है। विगत 70 वर्षों में केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन में 327 गुना वृद्धि हुई है। 1947 में बने प्रथम वेतन आयोग ने न्यूनतम वेतन 55 रुपये निर्धारित किया था, जो अब 327 गुना बढ़कर 18 हजार रुपये हो गया है। प्रथम वेतन आयोग ने केवल दस रुपये की वेतन-वृद्धि की थी।   

 

सातवें वेतन आयोग की जो सिफारिशें केंद्र सरकार ने लागू की हैं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि नौकरशाही को अब काम करना पड़ेगा। अब ऐसे कर्मचारियों के वेतन में वार्षिक वृद्धि नहीं होगी, जिनका प्रदर्शन निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं होगा। वार्षिक वेतन-वृद्धि एवं पदोन्नति के लिए प्रदर्शन का मानक अच्छा से बढ़ाकर बहुत अच्छा कर दिया गया है। मानकों को पूरा न करने वाले कर्मचारियों की वार्षिक वेतन-वृद्धि रोक दी जाएगी। जिन्हें वार्षिक वेतन-वृद्धि दी जाएगी, उसकी दर तीन प्रतिशत होगी। आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू ने आराम हराम है का नारा दिया था। किन्तु जैसा कि नेहरू का चरित्र था, उनकी कथनी और करनी में हमेशा अंतर होता था तथा उनके हर नारे खोखले नारे होकर रह जाते थे। यही हाल आराम हराम है नारे का हुआ तथा यथार्थ में वह नारा काम हराम है हो गया। फर्जी समाजवाद के नाम पर ट्रेड यूनियनों को प्रश्रय मिला तथा हड़तालें सरकारी कर्मचारियों की आदत व दिनचर्या हो गई। गठरी भर वेतन के साथ उन्हें तमाम तरह की सुविधाओं से लाद दिया गया, जिसके साथ घूस लेने की सुविधा भी प्राप्त हो गई। जनता को इस मेज से उस मेज तक तथा इस खिड़की से उस खिड़की तक दौड़ाकर सुविधा-शुल्‍क वसूलना सरकारी कर्मचारियों की प्रवृत्ति बन गई। परिणाम यह हुआ कि वेतन से अधिक उनकी घूस की कमाई हो गई। दुष्‍परिणाम जनता को भुगतना पड़ा और वह यातनाओं से बचने के लिए घूस देने को मजबूर हुई।


उत्तर प्रदेश सरकार ने पहले ही घोषित कर दिया है कि वह अपने कर्मचारियों को भी सातवें वेतन आयोग का लाभ प्रदान करेगी। उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव निकट है तथा चुनाव में सरकारी कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वे इतने संगठित व ताकतवर होते हैं कि सभी सरकारें उनसे डरती हैं तथा उन्हें अनाप-शनाप सुविधाएं देती रहती हैं। किन्तु सातवें वेतन आयोग की जो रिपोर्ट है, उसके अनुसार अब केंद्र सरकार के कर्मचारियों को काम भी करना पड़ेगा। इसीलिए लोगों को संदेह है कि केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों को भारी वेतन-भत्तों से लाद देने के बावजूद आयोग की रिपोर्ट का काम करना पड़ेगा वाला अंश लागू कर पाएगी, इस पर लोगों को संदेह है। 



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